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गुरुवार, जुलाई 23, 2020

विद्वता का घमण्ड न करें

एक समय की बात है संस्कृत के महान कवि को अपने ज्ञान को घमंड हो गया और वह संसार में अपने आप को सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी समझने लगे उनके इस घमंड को देखकर माँ सरस्वती को बहुत दुःख हुआ | उन्होंने सबक सिखाने के बारे में सोचती है |एक दिन कालिदास कहीं जा रहे थे और उन्हें .बहुत तेज की प्यास लगी  तो उन्हें दूर कुँए पर बैठी एक बुढ़िया दिखाई दिया |

कालिदास बोले :- माते पानी पिला दीजिए बड़ा पुण्य होगा

स्त्री बोली :- बेटा मैं तुम्हें जानती नहीं. अपना परिचय दो।

मैं अवश्य पानी पिला दूंगी।

कालिदास ने कहा :- मैं पथिक हूँ, कृपया पानी पिला दें।

स्त्री बोली :- तुम पथिक कैसे हो सकते हो, पथिक तो केवल दो ही हैं सूर्य व चन्द्रमा, जो कभी रुकते नहीं हमेशा चलते रहते। तुम इनमें से कौन हो सत्य बताओ।

कालिदास ने कहा :- मैं मेहमान हूँ, कृपया पानी पिला दें।

स्त्री बोली :- तुम मेहमान कैसे हो सकते हो ? संसार में दो ही मेहमान हैं।

पहला धन और दूसरा यौवन। इन्हें जाने में समय नहीं लगता। सत्य बताओ कौन हो तुम ?

(अब तक के सारे तर्क से पराजित हताश तो हो ही चुके थे)

कालिदास बोले :- मैं सहनशील हूं। अब आप पानी पिला दें।

स्त्री ने कहा :- नहीं, सहनशील तो दो ही हैं। पहली, धरती जो पापी-पुण्यात्मा सबका बोझ सहती है। उसकी छाती चीरकर बीज बो देने से भी अनाज के भंडार देती है, दूसरे पेड़ जिनको पत्थर मारो फिर भी मीठे फल देते हैं। तुम सहनशील नहीं। सच बताओ तुम कौन हो ?

(कालिदास लगभग मूर्च्छा की स्थिति में आ गए और तर्क-वितर्क से झल्लाकर बोले) 

कालिदास बोले :- मैं हठी हूँ ।

स्त्री बोली :- फिर असत्य. हठी तो दो ही हैं- पहला नख और दूसरे केश, कितना भी काटो बार-बार निकल आते हैं। सत्य कहें ब्राह्मण कौन हैं आप ?

(पूरी तरह अपमानित और पराजित हो चुके थे)

कालिदास ने कहा :- फिर तो मैं मूर्ख ही हूँ ।

स्त्री ने कहा :- नहीं तुम मूर्ख कैसे हो सकते हो।

मूर्ख दो ही हैं। पहला राजा जो बिना योग्यता के भी सब पर शासन करता है, और दूसरा दरबारी पंडित जो राजा को प्रसन्न करने के लिए ग़लत बात पर भी तर्क करके उसको सही सिद्ध करने की चेष्टा करता है।

(कुछ बोल न सकने की स्थिति में कालिदास वृद्धा के पैर पर गिर पड़े और पानी की याचना में गिड़गिड़ाने लगे) 

वृद्धा ने कहा :- उठो वत्स ! (आवाज़ सुनकर कालिदास ने ऊपर देखा तो साक्षात माता सरस्वती वहां खड़ी थी, कालिदास पुनः नतमस्तक हो गए)

माता ने कहा :- शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार । तूने शिक्षा के बल पर प्राप्त मान और प्रतिष्ठा को ही अपनी उपलब्धि मान लिया और अहंकार कर बैठे इसलिए मुझे तुम्हारे चक्षु खोलने के लिए ये स्वांग करना पड़ा।

कालिदास को अपनी गलती समझ में आ गई और भरपेट पानी पीकर वे आगे चल पड़े।

विद्वत्ता पर कभी घमण्ड न करें, यही घमण्ड विद्वत्ता को नष्ट कर देता है।


गुरुवार, मई 14, 2020

कथा महाराज भरतरी की


महर्षि वेद व्यास कहते है कि धर्म युक्त आचरण से   हमें अर्थ,काम और मोक्ष को प्राप्त करना चहिये |क्योंकि अगर आप का आचरण धर्म से युक्त नहीं है तो  अधर्म से कमाया गया अर्थ और प्राप्त काम पतन का कारण है |अगर काम में धर्म नहीं है तो विनाशकारी होता है  आज जो परिवार टूट रहे है उसका कारण केवल यह  है कि हम धर्म युक्त आचरण से दूर हो गये है |
यां चिन्तयामि सततं मायि सा विरक्ता,
साप्यन्य मिच्छ्ति जनं म जानोअन्यमक्त||
अस्म्स्कृते च परीतुष्यति काचिदन्या,
धिक्ताम् च तं च मदनम् च इमाम च माम् च ||
 मैं जिसका चिंतन करता हूँ वह मुझ से विरक्त होकर किसी दुसरे(पुरूष) की इच्छा करती है. और वह पुरूष किसी दूसरी स्त्री पर आसक्त है और वह स्त्री हम से प्रसन्न है |इसलिए तीनों को धिक्कार है और मुझे धिक्कार है जो इस सांसारिक झंझट में पड़ा हूँ |कामदेव को तो और भी धिक्कार है जो सब को नचा रहा है |
  इन पक्तियों के रचनाकार महाराज भरतरी की जीवन कथा  को पढ़ना और समझना चाहियें | महाराज भरतरी उज्जैन के महाराज और विक्रमादित्य के बड़े भाई थे|इनकी तीन रनिया थी जिसमे सबसे छोटी रानी का नाम पिंगला था जिससे महाराज को अत्यधिक स्नेह था, जबकि रानी को नगर कोतवाल से स्नेह था |
एक दिन महाराज के दरबार में एक सन्यासी आते है और एक  चमत्कारी फल देकर चले जाते है । राजा ने फल लेकर सोचा कि फल खाकर जीवन भर जवानी और सुंदरता बनी रहेगी पर उनकी प्रिय रानीबूढी हो जाएगी तो अच्छा नहीं होगा  । यह सोचकर राजा ने पिंगला को वह फल दे दिया।

जब राजा ने वह चमत्कारी फल रानी को दिया तो रानी ने सोचा कि यह फल यदि कोतवाल खाएगा तो वह लंबे समय तक उसकी मनोकामना  की पूर्ति कर सकेगा। रानी ने यह सोचकर चमत्कारी फल कोतवाल को दे दिया।
 कोतवाल  महोदय एक नगर गणिका  से प्रेम करते थे इस कारण उसने चमत्कारी फल उसे दे दिया। जिससे नगर गणिका  सदैव जवान और सुंदर बनी रहे। नगर गणिका का स्नेह राजा से था उसने वह फल राजा को दिया |फल देखते ही राजा को झटका लगा और उसी समय राज्य का त्याग कर दिया |जंगल में जाकर एक गुफा में तपस्या की और भरतरी शतक की रचना की | भरतरी शतक के तीन खंड है निति शतक,श्रृंगार शतक और वौराग्य शतक |


मंगलवार, मई 12, 2020

प्रेम रस मे डूबी बालिका और भक्त वत्सल भगवान की कथा

भगवान और भक्त का संबंध अटूट होता है ।‌वह जाति धर्म से परे है ।‌जाति और धर्म तो संसार के लोगो के द्वारा बनाया गया है । भगवान तो केवल भक्तों के बस में रहते है । सच्चे मन से उसे पुकारो तो । 
उड़ीसा में बैंगन बेचनेवाले की एक बालिका थी | दुनियाकी दृष्टिसे उसमें कोई अच्छाई नहीं थी | न धन था, न रूप | किन्तु दुनिया की दृष्टिसे नगण्य उस बालिका को संत जयदेव गोस्वामी जी का पद 
गीत गोविंदम बहुत ही भाता था | वह दिन-रात उसको गुनगुनाती रहती थी और भगवानके प्रेम में डूबती-उतराती रहती थी | 
वह घर का सारा काम करती, पिता-माता की सेवा करती और दिनभर जयदेव जी का पद गुनगुनाया करती और भगवान की यादमें मस्त रहती | 
पूर्णिमाकी रात थी, 
*पिताजी ने प्यारी बच्ची को जगाया और आज्ञा दी कि बेटी ! अभी चाँदनी टिकी है, इच प्रकाश में बैंगन तोड़ लो जिससे प्रातः मैं बेच आऊँ ।
वह गुनगुनाती हुई सोयी थी और गुनगुनाती हुई जाग गयी | जागने पर इस गुनगनाने में उसे बहुत रस मिल रहा था |
वह गुनगुनाती हुई बैंगन तोड़ने लगी, कभी इधर जाती, कभी उधर; क्योंकि चुन-चुनकर बैंगन तोड़ना था |उस समय एक ओर तो उसके रोम-रोमसे अनुराग झर रहा था और दूसरी ओर कण्ठसे गीतगोविन्द के सरस गीत प्रस्फुटित हो रहे थे |
प्रेमरूप भगवान् इसके पीछे कभी इधर आते, कभी उधर जाते | इस चक्कर में उनका पीताम्बर बैंगन के काँटों में उलझकर चिथड़ा हो रहा था, किन्तु इसका ज्ञान न तो बाला को हो रहा था और न उसके पीछे-पीछे दौड़नेवाले प्रेमी भगवान को ही |
विश्वको इस रहस्य का पता तब चला जब सबेरे भगवान् जगन्नाथ जी का पट खुला और उस देशके राजा पट खुलते ही भगवानकी झाँकी का दर्शन करने गये | उन्हें यह देखकर बहुत दुःख हुआ कि पुजारी ने नये पीताम्बर को भगवानको नहीं पहनाया था, जिसे वे शामको दे गये थे | वे समझ गये कि नया पीताम्बर पुजारीने रख लिया है और पुराना पीताम्बर भगवान को पहना दिया है |उन्होंने इस विषयमें पुजारी से पूछा | 
बेचारा पुजारी इस दृश्य को देखकर अवाक था | उसने तो भगवानको राजाका दिया नया पीताम्बर ही पहनाया था, किन्तु राजाको पुजारी की नीयत पर संदेह हुआ और उन्होंने उसे जेलमें डाल दिया |

निर्दोष पुजारी जेलमें भगवानके नामपर फूट-फूटकर रोने लगा |इसी बीचमें राजा कुछ विश्राम करने लगा और उसे नींद आ गयी | स्वप्नमें उसे भगवान जगन्नाथ जी के दर्शन हुए और सुनायी पड़ा कि पुजारी निर्दोष है, उसे सम्मान के साथ छोड़ दो | रह गयी बात नये पीताम्बरकी तो इस तथ्यको बैंगन के खेतमें जाकर स्वयं देख लो, पीताम्बर के फटे अंश बैंगन के काँटों में उलझे मिलेंगे |
 मैं तो प्रेमके अधीन हूँ, अपने प्रेमीजनों के पीछे-पीछे चक्कर लगाया करता हूँ | बैंगन तोड़नेवाली बालाके अनुरागभरे गीतों को सुनने के लिये मैं उसके पीछे-पीछे दौड़ा हूँ और इसीमें मेरा पीताम्बर काँटोंमें उलझकर फट गया |
जगन्नाथ-मन्दिरकी देख-रेख, भोग-आरती आदि सभी तरह व्यवस्था करने वाले राजा के जीवन में इस अद्भुत घटनाने रस भर दिया और भगवान के अनुराग में वे भी मस्त रहने लगे | बैंगन तोड़नेवाली एक बाला के पीछे-पीछे भगवान् उसके प्रेममें घूमते रहे |यह कहानी फूसकी आगकी तरह फैल गयी | जगत के स्वार्थी लोगों की भीड़ उसके पास आने लगी | कोई पुत्र माँगता तो कोई धन | 
इस तरह भगवान के प्रेममें बाधा पड़ते देख राजा ने जगन्नाथ मन्दिर में नित्य मंगला आरती के समय गीत गोविंद गाने के लिए उस बालिका को मंदिर में संरक्षण दिया और उसकी सुरक्षा-व्यवस्था की | तब से नित्य मंगला आरती में गीत गोविंद का गान श्री जगन्नाथ मन्दिर में होता आ रहा है।

गुरुवार, अप्रैल 23, 2015

वीर हक़ीक़त राय

इस 12 वर्षीय वीर बालक ने धर्म परिवर्तन के बदले अपना सिर कटवाना पसन्द किया और शहीद हो गया। उसे नहीं पता था कि तथाकथित धर्म-निर्पेक्ष नपुसंक हिन्दू ही पुनः मृतक तुल्य बना छोडें गे कि कोई उस का सार्वजनिक तौर पर नाम भी ना ले और हिन्दू मुसलिम सोहार्द का नाटक चलता रहै। आज इस वीर का नाम वर्तमान पीढी के मानसिक पटल से मिट चुका है और दिल्ली स्थित हिन्दू महासभा भवन में इस शहीद की मूक प्रतिमा उपेक्षित सी खडी है। बूढें नेहरू का जन्म तो मरणोपरान्त भी ‘बाल-दिवस’ के रूप में मनाया जाता है किन्तु आज कोई भी हिन्दू बालक वीर हकीकत राय के अनुपम बलिदान को नहीं जानता।

हकीकतराय का जन्म सियालकोट में 1724 को हुआ था। उस समय वह ऐक मात्र हिन्दू बालक मुस्लमान बालकों के साथ पढता था। उस की प्रगति से सहपाठी ईर्षालु थे और अकेला जान कर उसे बराबर चिडाते रहते थे। ऐक दिन मुस्लिम बालकों ने देवी दुर्गा के बारे में असभ्य अपशब्द कहे जिस पर हकीकतराय ने आपत्ति व्यक्त की। मुस्लिम बच्चों ने अपशब्दों को दोहरा दोहरा कर हकीकतराय को भडकाया और उस ने भी प्रतिक्रिया वश मुहमम्द की पुत्री फातिमा के बारे में वही शब्द दोहरा दिये।

मुस्लिम लडकों ने मौलवी को रिपोर्ट कर दी और मौलवी ने हकीकतराय को पैगंम्बर की शान में गुस्ताखी करने के अपराध में कैद करवा दिया। हकीकतराय के मातापिता ने ऐक के बाद ऐक लाहौर के स्थानीय शासक तक गुहार लगाई। उसे जिन्दा रहने के लिये मुस्लमान बन जाने का विकल्प दिया गया जो उस वीर बालक ने अस्वीकार कर दिया। उस ने अपने माता-पिता और दस वर्षिया पत्नी के सामने सिर कटवाना सम्मान जनक समझा। अतः 20 जनवरी 1735 को जल्लाद ने हकीकत राय का सिर काट कर धड से अलग कर दिया।

उपरोक्त ऐतिहासिक वृतान्त इस्लामी क्रूरता और नृशंस्ता के केवल अंशमात्र उदाहरण हैं। किन्तु हिन्दू समाज की कृतघन्ता है कि वह अपने वीरों को भूल चुका हैं जिन्हों ने बलिदान दिये थे। आज वह उन के नाम इस लिये नहीं लेना चाहते कि कहीं भारत में रहने वाले अल्पसंख्यक नाराज ना हो जायें। धर्म निर्पेक्ष भारत में अत्याचारी मुस्लिम शासकों के कई स्थल, मार्ग और मकबरे सरकारी खर्चों पर सजाये सँवारे जाते हैं। कई निम्न स्तर के राजनैताओं के मनहूस जन्म दिन और ‘पुन्य तिथियाँ’ भी सरकारी उत्सव की तरह मनायी जाती हैं परन्तु इन उपेक्षित वीरों का नाम भी लेना धर्म निर्पेक्षता का उलंघन माना जाता है।

हिन्दी ओलंपियाड की कक्षा 8 की अभ्यास पुस्तिका

  अंतर्राष्ट्रीय हिंदी ओलंपियाड कक्षा-8 अभ्यास प्रश्न अंतर्राष्ट्रीय हिंदी ओलंपियाड कक्षा-8: महत्वपूर...