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रविवार, मई 23, 2021
रविवार, अगस्त 02, 2020
हम कहाँ ?...
अल्फाज़ो की दुनिया मे,
बेज़ुबान हम कहाँ!
रगो की चाहत तो रखु,
पर फिर भी रागिन हम कहाँ!
खुशी खोजे हर नहीं,
पर नसे जो हो,
वही मिला!
जीवन के हर मोड़ पर,
चाहतो का अजीब एक मेला लगता है,
मंजिल के पीछे भागे हर कोई,
पर ये मंजिल किसे मिली,
उन लोगों ने हम कहाँ!
तो फिर उठा लू,
दिन भी बनाते हैं,
पर जब के रगीन कागज पर हम कहाँ!
https://youtu.be/zZm45kznglY
गुरुवार, मार्च 29, 2018
इस मक्कारी से भरे जहा में
इस मक्कारी से भरे जहां में
मुझे मक्कार बनकर जीना आता नहीं है
वो कला मुझे आती नहीं , जिसमें झूठ को सच सबित कर सके
केवल अपने लिए जीना आता नहीं
मुझे मक्कार बनकर जीना आता नहीं है
वो कला मुझे आती नहीं , जिसमें झूठ को सच सबित कर सके
केवल अपने लिए जीना आता नहीं
शायद मैं इसीलिए कतार मे सबसे पीछे हूं कि
मुझे होशियारी नही आती
मुझे होशियारी नही आती
लोग मुझे समझे ना समझे ,
मगर दोस्तों दगाबाजी मुझे आती नहीं ।
अपने लिए नहीं बस जीता हूँ केवल दोस्तों के लिए ।
वरना जीने की तमन्ना दिल में रह नहीं गयी हैं।
मगर दोस्तों दगाबाजी मुझे आती नहीं ।
अपने लिए नहीं बस जीता हूँ केवल दोस्तों के लिए ।
वरना जीने की तमन्ना दिल में रह नहीं गयी हैं।
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