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रविवार, सितंबर 06, 2026

जूझ' कहानी की प्रश्नोत्तरी

प्रश्न 1 दत्ताजी राव की सहायता के बिना ‘जूझ’ कहानी का ‘मैं’ पात्र वह सब नहीं पा सकता जो उसे मिला। टिप्पणी कीजिए। (CBSE-2008)     अथवा

  कहानीकार के शिक्षित होने के संघर्ष में दत्ताजी राव देसाई के योगदान को जूझ’ कहानी के आधार पर स्पष्ट कीजिए। (CBSE-2009, 2014)

 उत्तर हिंट – 'जूझ' आत्मकथात्मक उपन्यास में दत्ताजी राव का चरित्र नायक आनंदा के जीवन में एक 'उत्प्रेरक' और 'रक्षक' के रूप में उभरता है। यह कथन पूर्णतः सत्य है कि उनके हस्तक्षेप के बिना लेखक का  पढ़ने लिखने का सपना-सपना  ही रहता।

     आनंदा का पिता अपनी स्वार्थपूर्ति और आवारागर्दी के लिए उसे शिक्षा से वंचित कर खेतों के कठोर श्रम में झोंक चुका था। ऐसी विषम परिस्थिति में, दत्ताजी राव ने ही अपने सामाजिक वर्चस्व और कड़क रवैये से  उसके पिता विवश किया की आनंदा को विद्यालय भेजे |

     यदि दत्ताजी राव ने उस दिन यह संवेदनशीलता और दूरदर्शिता न दिखाई होती, तो आनंदा आजीवन खेतों की धूल फांकता रह जाता। उनका यह पुनीत सहयोग ही नायक के संघर्ष (जूझ) की वह प्रथम और निर्णायक विजय थी, जिसने एक शोषित खेतिहर बालक को एक श्रेष्ठ साहित्यकार में रूपांतरित कर दिया।


प्रश्न-2 जूझ’ कहानी में आपको किस पात्र ने सबसे अधिक प्रभावित किया और क्यों? उसकी किंहीं चार चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (CBSE-2008, 2013)

उत्तर हिंट -  दत्ता जी राव देसाई | आगे ऊपर वाला उत्तर लिख दे |

 

प्रश्न-3  -‘जूझ’ कहानी प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच संघर्ष की कहानी है। सिद्ध कीजिए।

           आनंद यादव रचित 'जूझ' (जिसका शाब्दिक अर्थ ही 'संघर्ष' है) पग-पग पर नायक आनंदा की विपरीत परिस्थितियों से जूझने की जीवंत गाथा है।

   आनंदा का पिता (दादा)  स्वार्थी प्रवृत्ति का है ,वह उसे पढ़ाना नहीं चाहता पर लेखक दत्ता जी राव के सहारे अपनी पढाई पुन: आरम्भ करवाता है| वह अपने पिता की शर्त को मान कर  सुबह-शाम खेतों पर काम करने जाता और पशु चराने जाता उसके बाद भी वह पढाई करता रहा | लंबे अंतराल के बाद स्कूल लौटने पर उसे अपने से छोटे बच्चों के साथ बैठना पड़ता है। वहाँ सहपाठियों द्वारा उसका  उपहास उड़ाया जाता है, फिर भी वह विचलित नहीं होता।

   कवित लिखना उसका शौक बन गया जब  कागज नही होता,  वह  भैंस की पीठ पर या कंकर से पत्थरों पर कविताएँ उकेर कर अपनी साहित्यिक अभ्यास को जारी रखता है।

निष्कर्ष:  इस तरह उसने अपने अदम्य साहस और अटूट संघर्ष (जूझ) से न केवल शिक्षा प्राप्त की, बल्कि एक श्रेष्ठ साहित्यकार बनकर यह सिद्ध कर दिया कि दृढ़ इच्छाशक्ति के आगे बड़ी से बड़ी बाधा भी घुटने टेक देती है।

 

 

प्रश्न-4.   ‘जूझ’ कहानी आधुनिक किशोर-किशोरियों को किन जीवन-मूल्यों की प्रेरणा दे सकती है? सोदाहरण स्पष्ट कीजिए। (CBSE-2014, 2017)

उत्तर हिंट – 'जूझ' (जिसका अर्थ है- संघर्ष) आनंदा यादव आत्मकथात्मक कहानी आधुनिक किशोर-किशोरियों  को अधोलिखित जीवन मूल्य देती है -

अदम्य संघर्ष क्षमता : पिता और  कक्षा के विद्यार्थियों से संघर्ष कर पढाई जारी रखता है |

·         कर्मठता और समय प्रबंधन: खेत के कार्य के    बाद भी पढाई जारी रखना   यह आज की पीढ़ी को सीमित संसाधनों और समय में श्रेष्ठ प्रदर्शन करने की प्रेरणा देता है।

·         शिक्षा के प्रति अगाध प्रेम व दूरदर्शिता: आनंदा यह भली-भांति जानता था कि पुश्तैनी खेती से जीवन का उद्धार नहीं होगा, शिक्षा ही उन्नति और सम्मान का एकमात्र मार्ग है।

·         समय  का सदुपयोग व रचनात्मकता: उसने अकेलेपन को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत बनाया। खेत में काम करते हुए भैंस की पीठ या पत्थरों पर कविताएँ रचना उसकी अद्भुत रचनात्मकता को दर्शाता है।

निष्कर्ष: यह कहानी आधुनिक युवाओं को यह संदेश देती है कि सच्ची लगन और निरंतर 'जूझने' (संघर्ष करने) की अदम्य इच्छाशक्ति से किसी भी असंभव लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।

 

प्रश्न5 - मराठी अध्यापक जी सौद्ल्गेकैर के अध्यापन की किन विशेषताओ से लेखक अत्यधिक प्रभावित हुआ था और इन विशेषताओ का लेखक पर क्या प्रभाव पडा? 

जूझ' कथा में लेखक आनंद यादव अपने मराठी शिक्षक सौंदलगेकर जी की काव्य-रसिकता, तल्लीनता और रसपूर्ण वाचन से अत्यधिक प्रभावित थे। शिक्षक महोदय कविता को केवल पढ़ाते नहीं थे, बल्कि सुर, ताल, छंदात्मक लय और सजीव अभिनय के साथ उसे कक्षा में जीवंत कर देते थे।

लेखक पर प्रभाव:

शिक्षक की इन विशेषताओं और उनकी स्वयं की मौलिक रचनाओं ने लेखक के भीतर की सुप्त काव्य-प्रतिभा को जाग्रत कर दिया। लेखक को यह बोध हुआ कि कवि कोई पारलौकिक जीव नहीं, बल्कि हमारे बीच का ही मनुष्य होता है। इसका जादुई प्रभाव यह हुआ कि:

वे खेतों में काम करते हुए भैंस की पीठ या पत्थरों पर अपनी कविताएँ उकेरने लगे।

 उनका एकांत का भय सर्वथा समाप्त हो गया; बल्कि वे एकांत की लालसा करने लगे, ताकि उन्मुक्त होकर कविताओं का सस्वर वाचन और अभिनय कर सकें।

इस प्रकार एक संघर्षरत किशोर के भीतर एक कवि का साहित्यिक प्रस्फुटन हुआ।

प्रश्न 6  --यह खेती हमें गढ्ढे में धकेल रही है | पढ़ लिख जाउगा तो नौकरी हाथ लग जाएगी, चार पैसे हाथ में रहेंगे | जूझ पाठ से उद्धत इस कथन के संदर्भ में ग्रामीण  युवाओं की मानसिक  स्थिति का वर्णन कीजिए |

उत्तर - 'जूझ' आत्मकथा का यह मार्मिक कथन ग्रामीण युवाओं के अंतर्द्वंद्व, यथार्थवादी दृष्टिकोण और भविष्य के प्रति उनकी गहरी चिंताओं को अत्यंत सटीक रूप से व्यक्त करता है।निम्नलिखित बिंदुओं द्वारा समझा जा सकता है:

ग्रामीण युवा (आनंदा जैसे किशोर) यह भली-भांति समझ चुके हैं कि पारंपरिक और वर्षा पर निर्भर खेती अब लाभ का सौदा नहीं रही। यह केवल हाड़-तोड़ श्रम मांगती है, लेकिन कोई आर्थिक सुरक्षा या प्रगति नहीं देती ("गड्ढे में धकेल रही है")।

  उन्हें यह स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है कि शिक्षा ही इस अज्ञानता, शोषण और दरिद्रता के चक्रव्यूह से बाहर निकलने का एकमात्र सशक्त हथियार है। शिक्षा उनके लिए केवल ज्ञान नहीं, बल्कि 'मुक्ति का मार्ग' है।

ग्रामीण युवा नौकरी प्राप्त कर ("चार पैसे हाथ में रहेंगे") एक स्थिर, सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन जीना चाहते हैं। वे पुश्तैनी मजदूरी छोड़कर समाज में अपनी एक स्वतंत्र पहचान बनाने के आकांक्षी हैं।

निष्कर्षतः: यह कथन ग्रामीण युवाओं की उस बेचैन मानसिक स्थिति का परिचायक है, जहाँ वे कृषि की विफलता और पारिवारिक बंधनों से मुक्त होकर, शिक्षा के माध्यम से अपने लिए एक सुरक्षित और उज्ज्वल भविष्य गढ़ने के लिए संघर्षरत (जूझ रहे) हैं।

 प्रश्न 7  --   जूझ पाठ  के आधार पर वसंत पाटिल के व्यवहार की विशेषताओ का उल्लेख करते हुए स्पष्ट कीजिए की उन विशेषताओ  का लेखक पर क्या प्रभाव पड़ा ?

'जूझ' आत्मकथात्मक उपन्यास में वसंत पाटिल लेखक (आनंदा) की कक्षा का एक अत्यंत होनहार छात्र है। उसके व्यवहार की विशेषताएँ :

 कुशाग्र बुद्धि और अध्ययनशील:   वह कक्षा का सबसे होशियार छात्र था। विशेष रूप से गणित में उसकी बहुत अच्छी पकड़ थी |

शांत और एकाग्र स्वभाव: वह हमेशा शांत रहता था। कक्षा में वह किसी तरह की कोई शरारत नहीं करता था

जिम्मेदार और अनुशासित: उसकी कुशाग्र बुद्धि और शांत स्वभाव के कारण ही  मास्टर जी ने उसे कक्षा का मॉनिटर बना दिया था।

इन विशेषताओं का लेखक (आनंदा) सकारात्मक पर प्रभाव:

सकारात्मक प्रतिस्पर्धा और प्रेरणा: अब लेखक वंसत पाटिल से आगे निकलना चाहता है |

आत्मविश्वास में वृद्धि : लेखक कक्षा में डरता नहीं  वरन चुनौती का सामना करता है |

शिक्षक का स्नेह और स्कूल से लगाव

निष्कर्ष: वसंत पाटिल का शांत और अध्ययनशील व्यवहार लेखक के लिए एक 'मार्गदर्शक ज्योति' बन गया, जिसने उसे पढ़ाई के प्रति पूर्णतः समर्पित कर दिया। इसी कारण  कहते है "जैसी संगति वैसी मति"

 प्रश्न 8  - आपके ख्याल से पढ़ाई लिखाई के सम्बन्ध में लेखक  पिता सही या दत्ता जी राव का रवैया | जूझ कहानी के आधार पर तर्क सहित उत्तर दे |

दत्ताजी राव का रवैया पूर्णतः सही और दूरदर्शी था, जबकि लेखक के पिता का दृष्टिकोण नितांत स्वार्थपूर्ण और गैर-जिम्मेदाराना था। पिता अपनी आवारागर्दी और श्रम से बचने के लिए बालक आनंदा को शिक्षा से वंचित कर रहा था, जो उसकी क्रूर मानसिकता को दर्शाता है।

 इसके विपरीत, गाँव के प्रभावशाली और समझदार व्यक्ति होने के नाते दत्ताजी राव ने न केवल पिता के अहंकार को तोड़ा, बल्कि आनंदा को पुनः विद्यालय भेजने का मार्ग भी प्रशस्त किया। यदि राव साहब का यह पुनीत हस्तक्षेप और समर्थन न मिलता, तो आनंदा का भविष्य अंधकारमय ही रह जाता।

 अतः दत्ताजी राव का दृष्टिकोण शत-प्रतिशत न्यायसंगत और सराहनीय था।

 प्रश्न 9  एक आदर्श अध्यापक छात्रों के व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण स्थान रखता है | जूझ कहानी के मास्टर      सौंदलगेकर के चरित्र के माध्यम से कथन की पुष्टि कीजिए |

उत्तर     'जूझ' कहानी में मराठी अध्यापक सौंदलगेकर जी का चरित्र यह सिद्ध करता है कि एक आदर्श शिक्षक छात्र के व्यक्तित्व का संपूर्ण कायाकल्प कर सकता है।


सौंदलगेकर जी न केवल अपनी विषय-ज्ञान में निपुण थे, बल्कि उनमें छात्रों को प्रेरित करने की अद्भुत क्षमता थी। वे कक्षा में कविता पूरे भाव, ताल और अभिनय के साथ गाते थे, जिससे आनंदा (मुख्य पात्र) के भीतर कविता के प्रति गहरा अनुराग जागा। उन्होंने आनंदा के आत्मविश्वास को बढ़ाया, उसे छंद, लय और अलंकार का ज्ञान दिया और उसकी शुरुआती रचनाओं को सुधारकर उसमें निखार लाया। 

उनके इसी स्नेहपूर्ण मार्गदर्शन और प्रोत्साहन के कारण एक साधारण किसान का बालक आनंदा एक सफल लेखक बन सका। वास्तव में, सौंदलगेकर जी ने आनंदा की सुप्त प्रतिभा को जगाकर उसके व्यक्तित्व और जीवन को नई दिशा दी।


अन्य प्रश्न - 10 आनंदा के पिता की  भांति आज भी अनेक  गरीब  पिता अपने बच्चो को स्कुल क्यों नही भेजना चाहते है ? 
  प्रश्न 11 -   जूझ कहानी के आधार पर बताईये पाठशाला में अनंदा का पहले दिन का अनुभव कैसा रहा  ?
प्रश्न 12 - जूझ कहानी के आधार पर बताइए  कि लेखक के अनंदा से आनन्द यादव बनने की यात्रा में मास्टर सौंदलगेकर  का क्या योगदान रहा ?


रविवार, नवंबर 02, 2025

📖 अपठित बोध: साहित्य और सौंदर्य-बोध

गद्यांश

सभी मनुष्य स्वभाव से ही साहित्य-स्रष्टा नहीं होते, पर साहित्य-प्रेमी होते हैं । मनुष्य का स्वभाव ही है सुंदर देखने का । घी का लड्डू टेढ़ा भी मीठा होता है, पर मनुष्य उसे गोल बनाकर सुंदर कर लेता है । मूर्ख-से-मूर्ख हलवाई के यहाँ भी गोल लड्डू ही प्राप्त होता है; लेकिन सुंदरता को सदा-सर्वदा तलाशने की शक्ति साधना के द्वारा प्राप्त होती है । उच्छृंखलता और सौंदर्य-बोध में अंतर है । बिगड़े दिमाग का युवक परायी बहू-बेटियों को घूरने को भी सौंदर्य-प्रेम कहता है, हालाँकि यह संसार की सर्वाधिक असुंदर बात है । जैसा कि पहले ही बताया गया है, सुंदरता सामंजस्य में होती है और सामंजस्य का अर्थ होता है- किसी चीज़ का न बहुत अधिक और न बहुत कम न होना । इसमें संयम की बड़ी ज़रूरत है । इसलिए सौंदर्य-प्रेम में संयम होता है, उच्छृंखलता नहीं । इस विषय में भी साहित्य ही हमारा मार्गदर्शक हो सकता है । जो व्यक्ति दूसरों के भावों का आदर करना नहीं जानता, उसे दूसरों से भी सद्भावना की आशा नहीं करनी चाहिए । मनुष्य कुछ ऐसी जटिलताओं में आ फँसा है कि उसके भावों को ठीक-ठीक पहचानना हर समय संभव नहीं होता । ऐसी अवस्था में हमें मनीषियों के चिंतन का सहारा लेना पड़ता है । इस दिशा में साहित्य के अलावा दूसरा उपाय नहीं है । मनुष्य की सर्वोत्तम कृति साहित्य है , और मनुष्य पद का अधिकारी बने रहने के लिए साहित्य ही उसका एकमात्र सहारा है । यहाँ साहित्य से हमारा अभिप्राय उसकी समस्त सात्त्विक चिंतन-धारा से है ।


✅ 1. बहुविकल्पीय प्रश्न

(i) सुंदरता को तलाश करने की शक्ति कैसे प्राप्त होती है?

  • (अ) संयम के द्वारा
  • (ब) साधना के द्वारा
  • (स) साहित्य प्रेम के द्वारा
  • (द) उच्छृंखलता के द्वारा
**सही उत्तर:** (ब) साधना के द्वारा

(ii) सामंजस्य का क्या अर्थ होता है?

  • (अ) किसी चीज़ का बहुत अधिक होना और किसी का बहुत कम होना।
  • (ब) किसी चीज़ का बहुत अधिक और किसी का बहुत कम होना।
  • (स) किसी चीज़ का न बहुत अधिक और न बहुत कम होना।
  • (द) उपर्युक्त सभी सही हैं।
**सही उत्तर:** (स) किसी चीज़ का न बहुत अधिक और न बहुत कम होना।

(iii) गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक है -

  • (अ) साहित्य और सौंदर्य-बोध
  • (ब) युवाओं की उच्छृंखलता
  • (स) संयम का महत्त्व
  • (द) साहित्य प्रेम
**सही उत्तर:** (अ) साहित्य और सौंदर्य-बोध

💡 2. अतिलघुत्तरात्मक प्रश्न

'साहित्य-स्रष्टा' का क्या अर्थ है?

**उत्तर:** साहित्य-स्रष्टा वे व्यक्ति होते हैं जो **साहित्य का सृजन** करते हैं।

✍️ 3. लघुत्तरात्मक प्रश्न

(i) जीवन में संयम की ज़रूरत क्यों है?

**उत्तर:** जीवन में संयम की ज़रूरत इसलिए है क्योंकि संयम से ही **सामंजस्य** का भाव उत्पन्न होता है, जिससे मनुष्य दूसरों की भावना का आदर कर सकता है।

(ii) लेखक ने संसार की सबसे बुरी बात किसे माना है और क्यों?

**उत्तर:** लेखक ने संसार की सबसे बुरी बात **परायी बहू-बेटियों को घूरना** बताया है, क्योंकि यह सौंदर्य-बोध के नाम पर **उच्छृंखलता** है।

(iii) उच्छृंखलता और सौंदर्य-बोध में क्या अंतर है?

**उत्तर:** उच्छृंखलता में **नियमों का पालन नहीं होता**, जबकि सौंदर्य-बोध में **संयम** होता है।

गुरुवार, सितंबर 12, 2024

कैसे करें कहानी का नाट्यरूपंरण


कहानी और नाटक में समानता (प्रतिदर्श प्रश्न पत्र 2024-25)

  • कथानक और घटनाक्रम: दोनों ही में एक केंद्रीय कहानी होती है जो विभिन्न घटनाओं से जुड़ी होती है। ये घटनाएं एक क्रम में होती हैं और कहानी को आगे बढ़ाती हैं।
  • पात्र और उनके रिश्ते: दोनों में पात्र होते हैं जिनके अपने-अपने व्यक्तित्व, लक्ष्य और इरादे होते हैं। इन पात्रों के बीच के रिश्ते कहानी और नाटक को आगे बढ़ाते हैं।
  • संघर्ष: दोनों में पात्रों को किसी न किसी तरह के संघर्ष का सामना करना पड़ता है। यह संघर्ष कहानी या नाटक का मुख्य बिंदु हो सकता है।
  • भावनाएं: दोनों में पात्रों की विभिन्न भावनाएं जैसे प्यार, नफरत, खुशी, दुख आदि को व्यक्त किया जाता है। ये भावनाएं पाठक या दर्शक को कहानी या नाटक से जोड़ती हैं।
  • संदेश: दोनों में कोई न कोई संदेश या विचार छिपा होता है जिसे लेखक पाठक या दर्शक तक पहुंचाना चाहता है। यह संदेश सामाजिक, राजनीतिक, या व्यक्तिगत हो सकता है।
  • शिखर (चर्मोत्कर्ष): दोनों में एक शिखर होता है जहां कहानी या नाटक अपने उच्चतम बिंदु पर पहुंचता है। यह वह बिंदु होता है जहां संघर्ष का समाधान होता है या पात्रों के जीवन में एक बड़ा बदलाव आता है।
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    कहानी और नाटक में अंतर -- 2023,

    1 प्रस्तुति-: कहानियाँ पढ़ी जाती हैं, नाटक मंचित होते हैं।

    2. अभिव्यक्ति-: कहानियाँ वर्णनात्मक होती हैं, नाटक संवाद और अभिनय पर निर्भर करते हैं।

    3. पात्र विकास-: कहानियों में पात्रों के आंतरिक विचार विस्तार से बताए जाते हैं, नाटक में यह मुख्य रूप से संवादों के माध्यम से होता है।

    4. दर्शक/पाठक-: कहानियाँ पाठकों को कल्पना करने का आमंत्रण देती हैं, नाटक दर्शकों के सामने लाइव प्रदर्शन प्रस्तुत करते हैं।

    5.दृश्य प्रस्तुतिकरण-: नाटक में दृश्य प्रभाव, मंच सज्जा, और लाइटिंग महत्वपूर्ण होते हैं; कहानियाँ इन पर निर्भर नहीं करतीं।

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    कहानी और नाटक में मुख्य अंतर:

    • पढ़ना या देखना: कहानी पढ़ी जाती है, जबकि नाटक मंच पर देखा जाता है।
    • कल्पना: कहानी में पाठक अपनी कल्पना से दृश्य बनाते हैं, जबकि नाटक में दृश्य पहले से तैयार होते हैं।
    • पात्र: कहानी में पात्रों के मन के भावों को विस्तार से बताया जाता है, जबकि नाटक में पात्रों के भाव उनके संवादों और अभिनय से समझ में आते हैं।

    • समय: कहानी में समय धीरे-धीरे बीतता है, जबकि नाटक में समय तेजी से बीतता है                                    ___________________________________________________________________
    •  कहानीकार द्वारा  कहानी के प्रसंगों या पात्रों के मानसिक द्वंदों के विवरण के दृश्यों कि नाटकीय प्रस्तुति में काफ़ी समस्या  आती है |' कथन के सन्दर्भ में  नाट्य रुपान्तरण कि चुनौतियों  का उल्लेख करें --          कहानी के नाट्य  रुपान्तरण  में आने वाली चुनौतियां :

    • संक्षिप्तीकरण: कहानी को नाटक में बदलते समय सबसे बड़ी चुनौती होती है। कहानी में कई विवरण, उपकथाएं और पात्रों को काटना पड़ता है। यह निर्णय लेना बहुत मुश्किल होता है कि कौन सी जानकारी रखनी है और कौन सी हटानी है।
    • स्थान, समय और सीमाएं: नाटक में स्थान और समय को दृश्यों के माध्यम से दिखाना होता है। कहानी में वर्णित कई स्थानों को एक ही मंच पर दर्शाना मुश्किल हो सकता है। समय के संदर्भ में, नाटक में समय का प्रवाह अधिक तेज होता है।
    • भाषा और व्याकरण: कहानी में लेखक अपनी भावनाओं को विस्तार से व्यक्त कर सकता है, लेकिन नाटक में संवादों को अधिक संक्षिप्त और प्रभावशाली होना चाहिए।
    • दृश्य संगठन: नाटक में दृश्य संगठन बहुत महत्वपूर्ण होता है। एक अच्छा दृश्य दर्शकों को कहानी में खींच सकता है।
    • नाटकीय प्रभाव: नाटक में भावनाओं को केवल शब्दों से नहीं, बल्कि अभिनय, संगीत और दृश्यों के माध्यम से भी व्यक्त किया जाता है।

    अतिरिक्त चुनौतियाँ:

    • चरित्र विकास: कहानी में पात्रों का विकास धीरे-धीरे होता है, जबकि नाटक में पात्रों को जल्दी से दर्शकों से परिचित कराना होता है।
    • कथानक: कहानी में कथानक अधिक जटिल हो सकता है, जबकि नाटक में कथानक सरल और सीधा होना चाहिए।
    • शैली: कहानी और नाटक की शैली अलग-अलग होती है। कहानी को नाटक में बदलते समय, कहानी की शैली को नाटक की शैली के अनुरूप बनाना होता है।
    • दर्शक: कहानी को कोई भी अकेले पढ़ सकता है, लेकिन नाटक को दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया जाता है। इसलिए, नाटक को दर्शकों के लिए अधिक आकर्षक बनाना होता है।                                                    ____________________________________________________________________________
    • कहानी के नाट्य रूपांतरण में संवाद के महत्व पर  टिप्पणी करें -CBSE प्रतिदर्श प्रश्न पत्र 2023 , 

    •                                   नाटक में संवादों की अहम भूमिका होती है। वे पात्रों को जीवंत बनाते हैं, कहानी को आगे बढ़ाते हैं और दर्शकों को कहानी में खींचते हैं।
      • संक्षिप्त और स्पष्ट: संवाद सीधे और संक्षिप्त होने चाहिए ताकि दर्शक उन्हें आसानी से समझ सकें।
      • पात्रानुकूल: हर पात्र के संवाद उसके व्यक्तित्व और पृष्ठभूमि के अनुरूप होने चाहिए।
      • प्रसंगानुकूल: संवाद कहानी के उस हिस्से के अनुरूप होना चाहिए जिसमें वे बोले जा रहे हैं।
      • बोलचाल की भाषा: जटिल शब्दों के बजाय सरल और आम बोलचाल की भाषा का उपयोग करना चाहिए।
      • कथानक को गति देना: संवादों से कहानी को आगे बढ़ाने में मदद मिलती है।
      • चरित्र चित्रण: संवादों के माध्यम से पात्रों के व्यक्तित्व को गहराई से दिखाया जा सकता है।
      • दृश्य के अनुकूल: संवादों को दृश्य के अनुरूप ढालना चाहिए, यानी वे दृश्य में हो रही घटनाओं को स्पष्ट करें।
      • सामाजिक और आर्थिक स्तर: संवादों से पात्रों का सामाजिक और आर्थिक स्तर पता चलना चाहिए।

      संक्षेप में: नाटक में संवाद कहानी की जान होते हैं। वे पात्रों को जीवंत बनाते हैं, कहानी को आगे बढ़ाते हैं और दर्शकों को कहानी में शामिल करते हैं। इसलिए, संवादों को सावधानीपूर्वक लिखना बहुत जरूरी है।

    मंगलवार, अगस्त 20, 2024

    भक्तिन (स्मृति की रेखाएँ) : महादेवी वर्मा Bhaktin (Smriti Ki Rekhayen) : Mahadevi Verma

     छोटे कद और दुबले शरीरवाली भक्तिन अपने पतले ओठों के कानों में दृढ़ संकल्प और छोटी आँखों में एक विचित्र समझदारी लेकर जिस दिन पहले-पहले मेरे पास आ उपस्थित हुई थी तब से आज तक एक युग का समय बीत चुका है। पर जब कोई जिज्ञासु उससे इस संबंध में प्रश्न कर बैठता है, तब वह पलकों को आधी पुतलियों तक गिराकर और चिन्तन की मुद्रा में ठुड्डी को कुछ ऊपर उठाकर विश्वास भरे कण्ठ से उत्तर देती हैं-- ‘तुम पचै का का बताई—यहै पचास बरिस से संग रहित है।’ इस हिसाब से मैं पचहत्तर की ठहरती हूँ और वह सौ वर्ष की आयु भी पार कर जाती है, इसका भक्तिन को पता नहीं। पता हो भी, तो सम्भवत: वह मेरे साथ बीते हुए समय में रत्तीभर भी कम न करना चाहेगी। मुझे तो विश्वास होता जा रहा है कि कुछ वर्ष तक पहुँचा देगी, चाहे उसके हिसाब से मुझे 150 वर्ष की असम्भव आयु का भार क्यों न ढोना पड़े।


    सेवक-धर्म में हनुमान जी से स्पर्द्धा करनेवाली भक्तिन किसी अंजना की पुत्री न होकर एक अनामधन्या गोपालिका की कन्या है-नाम है लाछमिन अर्थात लक्ष्मी। पर जैसे मेरे नाम की विशालता मेरे लिए दुर्वह है, वैसे ही लक्ष्मी की समृद्धि भक्तिन के कपाल की कुंचित रेखाओं में नहीं बँध सकी।] वैसे तो जीवन में प्राय: सभी को अपने-अपने नाम का विरोधाभास लेकर जीना पड़ता है; पर भक्तिन बहुत समझदार है, क्योंकि वह अपना समृद्धि सूचक नाम किसी को बताती नहीं। केवल जब नौकर की खोज में आई थी, तब ईमानदारी का परिचय देने के लिए उसने शेष इतिवृत्त के साथ यह भी बता दिया; पर इस प्रार्थना के साथ कि मैं कभी नाम का उपयोग न करूँ। उपनाम रखने की प्रतिमा होती, तो मैं सबसे पहले उसका प्रयोग अपने ऊपर करती, इस तथ्य को देहातिन क्या जाने, इसी से जब मैंने कण्ठी-माला देखकर उसका नया नामकरण किया, तब वह भक्तिन जैसे कवित्वहीन नाम को पाकर भी गद्गद् हो उठी।


    भक्तिन के जीवन का इतिवृत्त बिना जाने हुए उनके स्वभाव को पूर्णत: क्या अंशत: समझना भी कठिन होगा। वह ऐतिहासिक झूँसी में गाँव-प्रसिद्ध एक अहीर सूरमा की एकलौती बेटी ही नहीं, विमाता की किंवदन्ती बन जाने वाली ममता की काया में भी पली है। पाँच वर्ष की वय में उसे हँड़िया ग्राम के एक सम्पन्न गोपालक की सबसे छोटी पुत्रवधू बनाकर पिता ने शास्त्र से दो पग आगे रहने की ख्याति कमाई और नौ वर्षीय युवती का गौना देकर विमाता ने, बिना माँगे पराया धन लौटाने वाले महाजन का पुण्य लूटा।


    पिता का उस पर अगाध प्रेम होने के कारण स्वभावत: ईर्ष्यालु और सम्पत्ति की रक्षा में सतर्क विमाता ने उनके मरणान्तक रोग का समाचार तब भेजा, जब वह मृत्यु की सूचना भी बन चुका था। रोने-पीटने के अपशकुन से बचने के लिए सास ने भी उसे कुछ बताया। बहुत दिन से नैहर नहीं गई, सो जाकर देख आवे, यही कहकर और पहना-उढ़ाकर सास ने उसे विदा कर दिया। इस अप्रत्याशित अनुग्रह ने उसे पैरों में जो पंख लगा दिये थे, वे गाँव की सीमा में पहुँचते ही झड़ गये। ‘हाय लछमिन अब आई’ की अस्पष्ट पुनरावृत्तियाँ और स्पष्ट सहानुभूतिपूर्ण दृष्टियाँ उसे घर तक ठेल ले गईं। पर वहाँ न पिता का चिह्न शेष था, न विमाता के व्यवहार में शिष्टाचार का लेश था। दु:ख से शिथिल और अपमान से जलती हुई वह उस घर में पानी भी बिना पिये उल्टे पैरों ससुराल लौट पड़ी। सास को खरी-खोटी सुनाकर उसने विमाता पर आया हुआ क्रोध शान्त किया और पति के ऊपर गहने फेंक-फेंककर उसने पिता के चिर बिछोह की मर्मव्यथा व्यक्त की।


    जीवन के दूसरे परिच्छेद में भी सुख की अपेक्षा दु:ख ही अधिक है। जब उसने गेहुँएँ रंग और बटिया जैसे मुख वाली पहली कन्या के दो संस्करण और कर डाले तब सास और जिठानियों ने ओठ बिचकाकर उपेक्षा प्रकट की। उचित भी था, क्योंकि सास तीन-तीन कमाऊ वीरों की विधात्री बनकर मचिया के ऊपर विराजमान पुरखिन के पद पर अभिषिक्त हो चुकी थी और दोनों जिठानियाँ काक-भुशुण्डी जैसे काले लालों की क्रमबद्ध सृष्टि करके इस पद के लिए उम्मीदवार थीं। छोटी बहू के लीक छोड़कर चलने के कारण उसे दण्ड मिलना आवश्यक हो गया।


    जिठानियाँ बैठकर लोक चर्चा करतीं, और उनके कलूटे लड़के धूल उड़ाते; वह मट्ठा फेरती, कूटती, पीसती, राँघती और उसकी नन्हीं लड़कियाँ गोबर उठातीं, कंडे पाथतीं। जिठानियाँ अपने भात पर सफेद राब रखकर गाढ़ा दूध डालतीं और अपने गुड़ की डली के साथ कठौती में मट्ठा पीती उसकी लड़कियाँ चने-बाजरे की घुघरी चबातीं।


    इस दण्ड-विधान के भीतर कोई ऐसी धारा नहीं थी, जिसके अनुसार खोटे सिक्कों की टकसाल-जैसी पत्नी के पति को विरक्त किया जा सकता। सारी चुगली-चबाई की परिणति, उसके पत्नी-प्रेम को बढ़ाकर ही होती थी। जिठानियाँ बात-बात पर घमाघम पीटी-कूटी जातीं; पर उसके पति ने उसे कभी उँगली भी नहीं छुआई। वह बड़े बाप की बड़ी बात वाली बेटी को पहचानता था। इसके अतिरिक्त परिश्रमी, तेजस्वनी और पति के प्रति रोम-रोम से सच्ची पत्नी को वह चाहता भी बहुत रहा होगा, क्योंकि उसके प्रेम के बल पर ही पत्नी ने अलगौझा करके सबको अँगूठा दिखा दिया। काम वही करती थी, इसलिए गाय-भैंस, खेत-खलिहान, अमराई के पेड़ आदि के संबंध में उसी का ज्ञान बहुत बढ़ा-चढ़ा था। उसने छाँट-छाँट कर, ऊपर से असन्तोष की मुद्रा के साथ और भीतर से पुलकित होते हुए जो कुछ लिया, वह सबसे अच्छा भी रहा, साथ ही परिश्रमी दम्पत्ति के निरन्तर प्रयास से उसका सोना बन जाना भी स्वाभाविक हो गया।


    धूम-धाम से बड़ी लड़की का विवाह करने के उपरान्त, पति ने घरौंदे से खेलती हुई दो कन्याओं और कच्ची गृहस्थी का भार उन्तीस वर्ष की पत्नी पर छोड़कर संसार से विदा ली। जब वह मरा, तब उसकी अवस्था छत्तीस वर्ष से कुछ ही अधिक रही होगी; पर पत्नी उसे आज बुढ़ऊ कहकर स्मरण करती है। भक्तिन सोचती है कि जब वह बूढ़ी हो गई, तब क्या परमात्मा के यहाँ वे भी न बुढ़ा गये होंगे, अत: उन्हें बुढऊ न कहना उनका घोर अपमान है।


    हाँ, तो भक्तिन के हरे-भरे खेत, मोटी-ताजी गाय-भैंस और फलों से लदे पेड़ देखकर जेठ-जिठौतों के मुँह में पानी भर आना स्वाभाविक था। इन सबकी प्राप्ति तो तभी संभव थीं, जब भइयहू दूसरा घर कर लेती; पर जन्म से खोटी भक्तिन इनके चकमें में आई ही नहीं। उसने क्रोध से पाँव पटक-पटककर आँगन को कम्पायमान करते हुए कहा- ‘हम कुकुरी-बिलारी न होयँ, हमारा मन पुसाई तौ हम दूसरे के जाब नाहिं त तुम्हारा पचै के छाती पर होरहा भूँजब और राज करब, समुझे रहौ।’


    उसने ससुर, अजिया ससुर और जाने के पीढ़ियों के ससुरगणों की उपार्जित जगह-जमीन में से सुई की नोक के बराबर भी देने की उदारता नहीं दिखाई। इसके अतिरिक्त गुरु से कान-फुँकवा, कण्ठी बाँध पति के नाम पर घी से चिकने केशों को समर्पित कर अपने कभी न टलने की घोषणा कर दी। भविष्य में भी समर्पित सुरक्षित रखने के लिए उसने छोटी लड़कियों के हाथ पीले कर उन्हें ससुराल पहुँचाया और पति के चुने बड़े दामाद को घर जमाई बनाकर रखा। इस प्रकार उसके जीवन का तीसरा परिच्छेद आरम्भ हुआ।


    भक्तिन का दुर्भाग्य की उससे कम हठी नहीं था, इसी से किशोरी से युवती होते ही बड़ी लड़की भी विधवा हो गई। भइयहू से पार न पा सकने वाले जेठों और काकी को परास्त करने के लिए कटिबद्ध जिठौतों ने आशा की एक किरण देख पाई। विधवा बहिन के गठबन्धन के लिए बड़ा जिठौत अपने तीतर लड़ानेवाले साले को बुला लाया, क्योंकि उसका हो जाने पर सब कुछ उन्हीं के अधिकार में रहता है। भक्तिन की लड़की भी माँ से कम समझदार नहीं थी, इसी से उसने वर को नापसन्द कर दिया। बाहर के बहनोई का आना चचेरों भाईयों के लिए सुविधाजनक नहीं था, अत: यह प्रस्ताव जहाँ-का-तहाँ रह गया। तब वे दोनों माँ-बेटी खूब मन लगाकर अपनी सम्पत्ति की देख-भाल करने लगीं और ‘मान न मान मैं तेरा मेहमान’ की कहावत चरितार्थ करनेवाले वर के समर्थक उसे किसी-न-किसी प्रकार पति की पदवी पर अभिषिक्त करने का उपाय सोचने लगे।


    एक दिन माँ की अनुपस्थिति में वर महाशय ने बेटी की कोठरी में घुसकर भींतर से द्वार बन्द कर लिया और उसके समर्थक गाँववालों को बुलाने लगे। अहीर युवती ने जब इस डकैत वर की मरम्मत कर कुण्डी खोली, तब पंच बेचारे समस्या में पड़ गये। तीतरबाज युवक कहता था, वह निमन्त्रण पाकर भीतर गया और युवती उसके मुख पर अपनी पाँचों उंगलियों के उभार में इस निमन्त्रण के अक्षर पढ़ने का अनुरोध करती थी। अन्त में दूध-का-दूध पानी-का-पानी करने के लिए पंचायत बैठी और सबने सिर हिला-हिलाकर इस समस्या का मूल कारण कलियुग को स्वीकार किया। अपीलहीन फैसला हुआ कि चाहे उन दोनों में एक सच्चा हो चाहें दोनों झूठे; पर जब वे एक कोठरी से निकले, तब उनका पति-पत्नी के रूप में रहना ही कलियुग के दोष का परिमार्जन कर सकता है। अपमानित बालिका ने ओठ काटकर लहू निकाल लिया और माँ ने आग्नेय नेत्रों से गले पड़े दामाद को देखा। संबंध कुछ सुखकर नहीं हुआ, क्योंकि दामाद अब निश्चिंत होकर तीतर लड़ाता था और बेटी विवश क्रोध से जलती रहती थी। इतने यत्न से सँभाले हुए गाय-ढोर, खेती-बारी सब पारिवारिक द्वेष में ऐसे झुलस गये कि लगान अदा करना भी भारी हो गया, सुख से रहने की कौन कहे। अन्त में एक बार लगान न पहुँचने पर जमींदार ने भक्तिन को बुलाकर दिन भर कड़ी धूप में रखा। यह अपमान तो उसकी कर्मठता में सबसे बड़ा कलंक बन गया, अत: दूसरे ही दिन भक्तिन कमाई के विचार से शहर आ पहुँची।


    घुटी हुई चाँद को मोटी मैली धोती से ढाँके और मानों सब प्रकार की आहट सुनने के लिए एक कान कपड़े से बाहर निकाले हुए भक्तिन जब मेरे यहाँ सेवकधर्म में दीक्षित हुई, तब उसके जीवन के चौथे और सम्भवत: अन्तिम परिच्छेद का जो अर्थ हुआ, इसकी इति अभी दूर है।


    भक्तिन की वेश भूषा में गृहस्थ और बैरागी का सम्मिश्रण देखकर मैंने शंका से प्रश्न किया--‘क्या तुम खाना बनाना जानती हो ?’ उत्तर में उसने ऊपर से होठ को सिकोड़े और नीचे के अधर को कुछ बढ़ा कर आश्वासन की मुद्रा के साथ कहा-- ‘ई कउन बड़ी बात आय। रोटी बनाय जानित है, दाल राँध लेइत है, साग-भाजी छँउक सकित है अउर बाकी का रहा।


    दूसरे दिन तड़के ही सिर पर कई लोटे औंधाकर उसने मेरी धुली धोती जल के छींटा से पवित्र कर पहनी और पूर्व के अन्धकार और मेरी दीवार से फूटते हुए सूर्य और पीपल का, दो लोटे जल से अभिनन्दन किया। दो मिनट नाक दबाकर जप करने के उपरान्त जब वह कोयले की मोटी रेखा से अपने साम्राज्य की सीमा निश्चित कर चौके में प्रतिष्ठित हुई तब मैंने समझ लिया कि इस सेवक का साथ टेढ़ी खीर है। अपने भोजन के सम्बन्ध में नितान्त वीतराग होने पर भी मैं पाकविद्या के लिए परिवार भर में प्रख्यात हूँ और कोई भी पाक कुशल दूसरे के काम में नुक्ताचीनी बिना किये रह नहीं सकता। पर जब छूत पाक पर प्राण देनेवाले व्यक्तियों का, बात-बात पर भूखा मरना स्मरण हो आया और भक्तिन की शंकाकुल दृष्टि में छिपे हुए निषेध का अनुभव किया तब कोयले की रेखा मेरे लिए लक्ष्मण के धनुष से खींची हुई रेखा के समान दुर्लघ्य हो उठी। निरुपाय अपने कमरे में बिछौने पर पड़कर और नाक के ऊपर खुली हुई पुस्तक स्थापित कर मैं चौके में पीढ़े पर आसीन अनधिकारी को भूलने का प्रयास करने लगी।


    भोजन के समय जब मैंने अपनी निश्चित सीमा के भीतर निर्दिष्ट स्थान ग्रहण कर लिया तब भक्तिन ने प्रसन्नता से लबालब दृष्टि और आत्मतुष्टि से आप्लावित मुस्कराहट के साथ मेरी फूल की थाली में एक अंगुल मोटी और गहरी काली चित्तीदार चार रोटियाँ रखकर उसे टेढ़ी कर गाढ़ी दाल परोस दी । पर जब उसके उत्साह पर तुषारपात करते हुए मैंने रुआँसे भाव से कहा, 'यह क्या बनाया है' तब वह हतबुद्धि हो रही ।


    रोटियाँ अच्छी सेंकने के प्रयास में कुछ अधिक खरी हो गयी हैं पर अच्छी हैं, तरकारियाँ थीं पर जब दाल बनी है तब उनका क्या काम शाम को दाल न बनाकर तरकारी बना दी जाएगी। दूध-घी मुझे अच्छा नहीं लगता, नहीं तो सब ठीक हो जाता। अब न हो तो अमचूर और लाल मिर्च की चटनी पीस ली जावे । उससे भी काम न चले तो वह गाँव से लायी हुई गठरी में से थोड़ा-सा गुड़ दे देगी। और शहर के लोग क्या कलाबत्तू खाते हैं? फिर वह कुछ अनाड़िन या फूहड़ नहीं। उसके ससुर, पितिया ससुर, अजिया सास आदि ने उसकी पाककुशलता के लिए न जाने कितने मौखिक प्रमाणपत्र दे डाले हैं।


    भक्तिन के इस सारगर्भित लेक्चर का प्रभाव यह हुआ कि मैं, मीठे से विरक्ति के कारण बिना गुड़ के और घी से अरुचि के कारण रूखी दाल से एक मोटी रोटी खाकर बहुत ठाठ से यूनिवर्सिटी पहुँची और न्यायसूत्र पढ़ते-पढ़ते शहर और देहात के जीवन के इस अन्तर पर विचार करती रही।


    अलग भोजन की व्यवस्था करनी पड़ी थी अपने गिरते हुए स्वास्थ्य और परिवारवालों की चिन्ता निवारण के लिए, पर प्रबन्ध ऐसा हो गया कि उपचार का प्रश्न ही खो गया। इस देहाती वृद्धा ने जीवन की सरलता के प्रति मुझे इतना जाग्रत् कर दिया था कि मैं अपनी असुविधाएँ छिपाने लगी, सुविधाओं की चिन्ता करना तो दूर की बात।


    इसके अतिरिक्त भक्तिन का स्वभाव ही ऐसा बन चुका है कि वह दूसरों को अपने मन के अनुसार बना लेना चाहती है, पर अपने सम्बन्ध में किसी प्रकार के परिवर्तन की कल्पना तक उसके लिए सम्भव नहीं। इसी से आज मैं अधिक देहाती हूँ, पर उसे शहर की हवा नहीं लग पायी। मकई का रात को बना दलिया सवेरे मट्ठे से सौंधा लगता है, बाजरे के तिल लगाकर बनाये हुए पुए गरम कम अच्छे लगते हैं, ज्वार के भुने हुए भुट्टे के हरे दानों की खिचड़ी स्वादिष्ट होती है, सफेद महुए की लपसी संसार भर के हलवे को लजा सकती है आदि वह मुझे क्रियात्मक रूप से सिखाती रहती है। पर यहाँ का रसगुल्ला तक भक्तिन के पोपले मुँह में प्रवेश करने का सौभाग्य नहीं प्राप्त कर सका। मेरे रात-दिन नाराज होने पर भी उसने साफ धोती पहनना नहीं सीखा, पर मेरे स्वयं धोकर फैलाये हुए कपड़ों को भी वह तह करने के बहाने सिलवटों से भर देती है। मुझे उसने अपनी भाषा की अनेक दन्तकथाएँ कण्ठस्थ करा दी हैं पर पुकारने पर वह 'ओय' के स्थान में 'जी' कहने का शिष्टाचार भी नहीं सीख सकी।


    भक्तिन अच्छी है यह कहना कठिन होगा, क्योंकि उसमें दुर्गुणों का अभाव नहीं। वह सत्यवादी हरिश्चन्द्र नहीं बन सकती पर 'नरो वा कुंजरो वा' कहने में भी विश्वास नहीं करती। मेरे इधर-उधर पड़े पैसे रुपये, भण्डारघर की किसी मटकी में कैसे अन्तर्हित हो जाते हैं, यह रहस्य भी भक्तिन जानती है। पर इस सम्बन्ध में किसी के संकेत करते ही वह उसे शास्त्रार्थ के लिए ऐसी चुनौती दे डालती है जिसको स्वीकार कर लेना किसी तर्क-शिरोमणि के लिए भी सम्भव नहीं। यह उसका अपना घर ठहरा- पैसा रुपया जो इधर-उधर पड़ा देखा सँभालकर रख लिया। यह क्या चोरी है? उसके जीवन का परम कर्तव्य मुझे प्रसन्न रखना है-जिस बात से मुझे क्रोध आ सकता है उसे कुछ बदलकर इधर-उधर करके बताना क्या झूठ है ? इतनी चोरी और इतना झूठ तो धर्मराज महाराज में भी होगा, नहीं तो वे भगवानजी को कैसे प्रसन्न रख सकते और संसार को कैसे चला सकते!


    शास्त्र का प्रश्न भी भक्तिन अपनी सुविधा के अनुसार सुलझा लेती है। मुझे स्त्रियों का सिर घुटना अच्छा नहीं लगता, अतः मैंने भक्तिन को रोका। उसने अकुण्ठित भाव से उत्तर दिया कि शास्त्र में लिखा है । कुतूहलवश मैं पूछ ही बैठी, 'क्या लिखा है' तुरन्त उत्तर मिला 'तीरथ गये मुड़ाये सिद्ध' कौन-से शास्त्र का यह रहस्यमय सूत्र है, यह जान लेना मेरे लिए सम्भव ही नहीं था। अतः मैं हारकर मौन हो रही और भक्तिन का चूड़ाकर्म हर बृहस्पतिवार को, एक दरिद्र नापित के गंगाजल से धुले अस्तुरे द्वारा यथाविधि निष्पन्न होता रहा ।


    पर वह मूर्ख है या विद्याबुद्धि का महत्त्व नहीं जानती, यह कहना असत्य कहना है। अपने विद्या के अभाव को वह मेरी पढ़ाई-लिखाई पर अभिमान करके भर लेती है। एक बार जब मैंने सब काम करनेवालों से अँगूठे के निशान के स्थान में हस्ताक्षर लेने का नियम बनाया तब भक्तिन बड़े कष्ट में पड़ गयी, क्योंकि एक तो उससे पढ़ने की मुसीबत नहीं उठायी जा सकती थी; दूसरे सब गाड़ीवान दाइयों के साथ बैठकर पढ़ना उसकी वयोवृद्धता का अपमान था। अतः उसने कहना आरम्भ किया, 'हमार मलकिन तौ रात-दिन कितबियन माँ गड़ी रहति हैं। अब हमहूँ पढ़े लागब तौ घर-गिरिस्ती कउन देखी-सुनी।'


    पढ़ानेवाले और पढ़नेवाले दोनों पर इस तर्क का ऐसा प्रभाव पड़ा कि भक्तिन इन्स्पेक्टर के समान क्लास में घूम-घूमकर किसी के आ इ की बनावट, किसी के हाथ की मन्थरता, किसी के बुद्धि की मन्दता पर टीका-टिप्पणी करने का अधिकार पा गयी। उसे तो अँगूठा निशानी देकर वेतन लेना नहीं होता, इससे बिना पढ़े ही वह पढ़नेवालों की गुरु बन बैठी। वह अपने तर्क ही नहीं, तर्कहीनता के लिए भी प्रमाण खोज लेने में पटु है। अपने आपको महत्त्व देने के लिए ही वह अपनी मालकिन को असाधारणता देना चाहती है, पर इसके लिए भी प्रमाण की खोज-ढूँढ़ आवश्यक हो उठती है। ।


    जब एक बार मैं उत्तर - पुस्तकों और चित्रों को लेकर व्यस्त थी तब भक्तिन सबसे कहती घूमी, 'ऊ बिचरिअउ तौ रातदिन काम माँ झुकी रहति है, अउर तुम पचे घुमती फिरती हौ ! चलौ तनिक तिनुक हाथ बँटाय लेउ ।' सब जानते थे कि ऐसे कामों में हाथ नहीं बँटाया जा सकता, अतः उन्होंने अपनी असमर्थता प्रकट कर भक्तिन से पिण्ड छुड़ाया। बस इसी प्रमाण के आधार पर उसकी सब अतिशयोक्तियाँ अमरबेलि सी फैलने लगीं उसकी मालकिन जैसा काम कोई जानता ही नहीं, इसी से तो बुलाने पर भी कोई हाथ बँटाने की हिम्मत नहीं करता ।


    पर वह स्वयं कोई सहायता नहीं दे सकती, इसे मानना अपनी हीनता स्वीकार करना है - इसी से वह द्वार पर बैठकर बार-बार कुछ काम बताने का आग्रह करती है। कभी उत्तर - पुस्तकों को बाँधकर, कभी अधूरे चित्र को कोने में रखकर, कभी रंग की प्याली धोकर और कभी चटाई को आँचल से झाड़कर वह जैसी सहायता पहुँचाती है उससे भक्तिन का अन्य व्यक्तियों से अधिक बुद्धिमान होना प्रमाणित हो जाता है। वह जानती है कि जब दूसरे मेरा हाथ बँटाने की कल्पना तक नहीं कर सकते तब वह सहायता की इच्छा को क्रियात्मक रूप देती है, इसी से मेरी किसी पुस्तक के प्रकाशित होने पर उसके मुख पर प्रसन्नता की आभा वैसे ही उद्भासित हो उठती है जैसे स्विच दबाने से बल्ब में छिपा आलोक । वह सूने में उसे बार-बार छूकर, आँखों के निकट ले जाकर और सब ओर घुमा-फिराकर मानो अपनी सहायता का अंश खोजती है और उसकी दृष्टि में व्यक्त आत्मतोष कहता है कि उसे निराश नहीं होना पड़ता। यह स्वाभाविक भी है। किसी चित्र को पूरा करने में व्यस्त, मैं जब बार-बार कहने पर भी भोजन के लिए नहीं उठती तब वह कभी दही का शर्बत, कभी तुलसी की चाय वहीं देकर भूख का कष्ट नहीं सहने देती ।


    दिन भर के कार्य भार से छुट्टी पाकर जब मैं कोई लेख समाप्त करने या भाव को छन्दबद्ध करने बैठती हूँ तब छात्रावास की रोशनी बुझ चुकती है, मेरी हिरनी सोना तख्त के पैताने फर्श पर बैठकर पागुर करना बन्द कर देती है, कुत्ता वसन्त छोटी मचिया पर पंजों में मुख रखकर आँखें मूँद लेता है और बिल्ली गोधूली मेरे तकिये पर सिकुड़कर सो रहती है।


    पर मुझे रात की निस्तब्धता में अकेला न छोड़ने के विचार से कोने में दरी के आसन पर बैठकर बिजली की चकाचौंध से आँखें मिचमिचाती हुई भक्तिन प्रशान्त भाव से जागरण करती है। वह ऊँघती भी नहीं, क्योंकि मेरे सिर उठाते ही उसकी धुँधली दृष्टि मेरी आँखों का अनुसरण करने लगती है। यदि मैं सिरहाने रखे रैक की ओर देखती हूँ तो वह उठकर आवश्यक पुस्तक का रंग पूछती है, यदि मैं कलम रख देती हूँ तो वह स्याही उठा लाती है और यदि मैं कागज एक ओर सरका देती हूँ तो वह दूसरी फाइल टटोलती है।


    बहुत रात गये सोने पर भी मैं जल्दी ही उठती हूँ और भक्तिन को तो मुझसे भी पहले जागना पड़ता है सोना उछल-कूद के लिए बाहर जाने को आकुल रहती है, बसन्त नित्य कर्म के लिए दरवाजा खुलवाना चाहता है, ओर गोधूली चिड़ियों की चहचहाहट में शिकार का आमन्त्रण सुन लेती है ।


    मेरे भ्रमण की भी एकान्त साथिन भक्तिन ही रही है। बदरी-केदार आदि के ऊँचे-नीचे और तंग पहाड़ी रास्ते में जैसे वह हठ करके मेरे आगे चलती रही है, वैसे ही गाँव की धूलभरी पगडण्डी पर मेरे पीछे रहना नहीं भूलती। किसी भी परिस्थिति में, किसी भी समय, कहीं भी जाने के लिए प्रस्तुत होते ही मैं भक्तिन को छाया के समान साथ पाती हूँ ।


    युद्ध को देश की सीमा में बढ़ते देख जब लोग आतंकित हो उठे तब भक्तिन के बेटी-दामाद उसके नाती को लेकर बुलाने आ पहुँचे, पर बहुत समझाने-बुझाने पर भी वह उनके साथ नहीं जा सकी। सबको वह देख आती है, रुपया भेज देती है, पर उनके साथ रहने के लिए मेरा साथ छोड़ना आवश्यक है जो सम्भवतः भक्तिन को जीवन के अन्त तक स्वीकार न होगा ।


    जब गतवर्ष युद्ध के भूत ने वीरता के स्थान में पलायन-वृत्ति जगा दी थी तब भक्तिन पहली ही बार सेवक की विनीत मुद्रा के साथ मुझसे गाँव चलने का अनुरोध करने आयी। वह लकड़ी रखने के मचान पर अपनी नयी धोती बिछाकर मेरे कपड़े रख देगी, दीवार में कीलें गाड़कर और उन पर तख्ते रखकर मेरी किताबें सजा देगी, धान के पुआल का गोंदरा बनवाकर और उस पर अपना कम्बल बिछाकर वह मेरे सोने का प्रबन्ध करेगी, मेरे रंग, स्याही, आदि को नयी हँडियों में सँजोकर रख देगी और कागत - पत्रों को छीके में यथाविधि एकत्र कर देगी।


    मेरे पास वहाँ जाकर रहने के लिए रुपया नहीं है, यह मैंने भक्तिन के प्रस्ताव को अवकाश न देने के लिए कहा था, पर उसके परिणाम ने मुझे विस्मित कर दिया। भक्तिन ने परम रहस्य का उद्घाटन करने की मुद्रा बनाकर और अपना पोपला मुँह मेरे कान के पास लाकर हौले-हौले बताया कि उसके पाँच बीसी और पाँच रुपया गड़ा रखा है। उसी से वह सब प्रबन्ध कर लेगी। फिर लड़ाई तो कुछ अमरौती खाकर आयी नहीं है। जब सब ठीक हो जाएगा तब यहीं लौट आएँगे ।


    भक्तिन की कंजूसी के प्रमाण पुंजीभूत होते-होते पर्वताकार बन चुके थे, परन्तु इस उदारता के डाइनामाइट ने क्षण-भर में उन्हें उड़ा दिया। इतने थोड़े रुपये का कोई महत्त्व नहीं, परन्तु रुपये के प्रति भक्तिन का अनुराग इतना प्रख्यात हो चुका है कि मेरे लिए उसका परित्याग मेरे महत्त्व को सीमा तक पहुँचा देता है ।


    भक्तिन और मेरे बीच में सेवक- स्वामी का सम्बन्ध है, यह कहना कठिन है, क्योंकि ऐसा कोई स्वामी नहीं हो सकता जो इच्छा होने पर भी सेवक को अपनी सेवा से हटा न सके और ऐसा कोई सेवक भी नहीं सुना गया जो स्वामी से चले जाने का आदेश पाकर अवज्ञा से हँस दे। भक्तिन को नौकर कहना उतना ही असंगत है जितना अपने घर में बारी-बारी से आने-जानेवाले अँधेरे-उजाले और आँगन में फूलनेवाले गुलाब और आम को सेवक मानना । वे जिस प्रकार एक अस्तित्व रखते हैं जिसे सार्थकता देने के लिए ही हमें सुख-दुःख देते हैं उसी प्रकार भक्तिन का स्वतन्त्र व्यक्तित्व अपने विकास के परिचय के लिए ही मेरे जीवन को घेरे हुए है।


    परिवार और परिस्थितियों के कारण उसके स्वभाव में जो विषमताएँ उत्पन्न हो गयी हैं उनके भीतर से एक स्नेह और सहानुभूति की आभा फूटती रहती है, इसी से उसके सम्पर्क में आनेवाले व्यक्ति उसमें जीवन की सहज मार्मिकता ही पाते हैं। छात्रावास की बालिकाओं में से कोई अपनी चाय बनवाने के लिए उसके चौके के कोने में घुसी रहती है, कोई दूध औटवाने के लिए देहली पर बैठी रहती है, कोई बाहर खड़ी मेरे लिए बने नाश्ते को चखकर उसके स्वाद की विवेचना करती रहती है। मेरे बाहर निकलते ही सब चिड़ियों के समान उड़ जाती हैं और भीतर आते ही यथास्थान विराजमान हो जाती हैं। इन्हें आने में रुकावट न हो सम्भवतः इसी से भक्तिन अपना दोनों जून का भोजन सवेरे ही बनाकर ऊपर के आले में रख देती है और खाते समय चौके का एक कोना धोकर पाकछूत के सनातन नियम से समझौता कर लेती है।


    मेरे परिचितों और साहित्यिक बन्धुओं से भी भक्तिन विशेष परिचित है, पर उनके प्रति भक्तिन के सम्मान की मात्रा, मेरे प्रति उनके सम्मान की मात्रा पर निर्भर है और सद्भाव उनके प्रति मेरे सद्भाव से निश्चित होता है। इस सम्बन्ध में भक्तिन की सहजबुद्धि विस्मित कर देनेवाली है ।


    वह किसी को आकार-प्रकार और वेशभूषा से स्मरण करती है और किसी को नाम के अपभ्रंश द्वारा। कवि और कविता के सम्बन्ध में उसका ज्ञान बढ़ा है पर आदर भाव नहीं। किसी के लम्बे बाल और अस्त-व्यस्त वेशभूषा देखकर वह कह उठती है, 'का ओहू कवित्त लिख जानत हैं और तुरन्त ही उसकी अवज्ञा प्रकट हो जाती है, 'तब ऊ कुच्छौ करिहें धरिहैं, ना- बस गली-गली गाउत - बजाउत फिरिहैं ।'


    पर सबका दुःख उसे प्रभावित कर सकता है। विद्यार्थी वर्ग में से कोई जब कारागार का अतिथि हो जाता है तब उस समाचार से व्यथित भक्तिन 'बीता बीता भरे लड़कन का जेहल - कलजुग रहा तौन रहा अब परलय होई जाई उनकर माई का बड़े लाट तक लड़े का चही' कहकर दिनभर सबको परेशान करती रहती है। बापू से लेकर साधारण व्यक्ति तक सबके प्रति भक्तिन की सहानुभूति एकरस मिलती है।


    भक्तिन के संस्कार ऐसे हैं कि वह कारागार से वैसे ही डरती है जैसे यमलोक से। ऊँची दीवार देखते ही वह आँख मूँदकर बेहोश हो जाना चाहती है। उसकी यह कमजोरी इतनी प्रसिद्धि पा चुकी है कि लोग मेरे जाने की सम्भावना बता-बताकर उसे चिढ़ाते रहते हैं। वह डरती नहीं, यह कहना असत्य होगा, पर डर से भी अधिक महत्त्व मेरे साथ का ठहरता है। चुपचाप मुझसे पूछने लगती है कि वह अपनी के धोती साबुन से साफ कर ले जिससे मुझे वहाँ उसके लिए लज्जित न होना पड़े। क्या-क्या सामान बाँध ले जिससे मुझे वहाँ किसी प्रकार की असुविधा न हो सके। ऐसी यात्रा में किसी को किसी के साथ जाने का अधिकार नहीं, यह आश्वासन भक्तिन के लिए कोई मूल्य नहीं रखता। वह मेरे न जाने की कल्पना से इतनी प्रसन्न नहीं होती जितनी अपने साथ न जा सकने की सम्भावना से अपमानित । भला ऐसा अन्धेर हो सकता है ! जहाँ मालिक वहाँ नौकर-मालिक को ले जाकर बन्द कर देने में इतना अन्याय नहीं पर नौकर को अकेले मुक्त छोड़ देने में पहाड़ के बराबर अन्याय है। ऐसा अन्याय होने पर भक्तिन को बड़े लाट तक लड़ना पड़ेगा। किसी की माई यदि बड़े लाट तक नहीं लड़ी तो नहीं लड़ी पर भक्तिन का तो बिना लड़े काम ही नहीं चल सकता।

    ऐसे विषम प्रतिद्वन्द्वियों की स्थिति कल्पना में भी दुर्लभ है।

    मैं प्रायः सोचती हूँ कि जब ऐसा बुलावा आ पहुँचेगा जिसमें न धोती साफ करने का अवकाश रहेगा न सामान बाँधने का, न भक्तिन को रुकने का अधिकार होगा न मुझे रोकने का, तब चिर विदा के अन्तिम क्षणों में यह देहातिन वृद्धा क्या करेगी और मैं क्या कहूँगी ?

    भक्तिन की कहानी अधूरी है पर उसे खोकर मैं इसे पूरी नहीं करना चाहती।

    भारत के विकास में हिन्दी का योगदान

      भारत के अभ्युदय और विकास की महायात्रा में हिन्दी का योगदान भाषा केवल विचारों के संप्रेषण का माध्यम मात्र नहीं होती; वह किसी राष्ट्र की आत्...