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रविवार, मई 23, 2021
शनिवार, नवंबर 09, 2019
1833 का चार्टर अधिनियम
1833 का चार्टर
अधिनियम – भारत का केंद्रीय करण किया गया |बंगाल के गवर्नर को भारत का गवर्नर जनरल
बना दिया गया |
इसको ब्रिटिश कब्जे
वाले सम्पूर्ण भारतीय क्षेत्र पर नियत्रण हो गया | इसकों सैन्य एवं नागरिक
शक्तियां दे दिया गया है |लार्ड विलियम बैंटिक भारत के प्रथम गवर्नर जनरल बने थे |
गवर्नर जनरल को
विधायिका के असीमित अधिकार दे दिया गया |संपूर्ण भारत के लिए कानून बना सकता है |
इस अधिनियम से पहले
के कानून को नियामक कानून कहाँ गया | उसके बाद के बने कानून को एक्ट या अधिनियम
कहाँ गया |
पिट्स इण्डिया एक्ट
रेगुलेटिंग एक्ट
1773 की कमियों को दूर करने के लिए एक्ट ऑफ सैटलमेंट 1781 पारित किया गया |उसके
बाद 1784 में पिट्स इण्डिया एक्ट पारित किया गया | इस एक्ट की महत्वपूर्ण विशेषता
इस प्रकार है |
कंपनी के राजनैतिक
और वाणिज्यिक कार्यो को पृथक किया गया |कंपनी के राजनैतिक मामलों पर नियंत्रण के
लिए नियत्रण बोर्ड ( बोर्ड ऑफ कंट्रोल) नाम से एक निकाय का गठन किया गया | इस
प्रकार से द्वैध शासन की व्यवस्था का
आरम्भ किया है |
पहली बार कम्पनी के
अधीन के क्षेत्र को ब्रिटिश आधिपत्य का क्षेत्र कहा गया |
ब्रिटिश सरकार में
कम्पनी के कार्यों और इसके प्रशासन पर पूर्ण नियंत्रण प्रदान किया गया |यह नियंत्रण नियंत्रण बोर्ड के माध्यम से किया गया
| नियंत्रण बोर्ड भारत के सभी नागरिक सैन्य सरकार व् राजस्व गतिविधियों पर
नियंत्रण करें |
नियामक अधिनियम 1773
- कंपनी के कर्मचारियो को व्यक्तिगत व्यापार करने एवं भारतीयों से रिश्वत एवं उपहार लेने से रोका गया |
- पहली बार कंपनी को प्रशासनिक एवं राजनैतिक मान्यता मिली |
- •कंपनी की गवर्निग निकाय ‘कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के माध्यम से कंपनी पर ब्रिटिश सरकार का नियत्रण आ गया | क्योकि इस निकाय को कंपनी राजस्व ,नागरिक और सैन्य मामलों की जानकारी देना आवश्यक कर दिया गया |
- •भारत में केंद्रीय प्रशासन का आरम्भ हुआ | बंगाल के गवर्नर को बंगाल का गवर्नर जनरल बना दिया गया इसकी सहायता के चार सदस्यी कार्यकारी परिषद् का गठन किया गया |
- •वारेन हेस्टिंग पहले गवर्नर जनरल बने |
- •बंबई एवं मद्रास के गवर्नर को बंगाल के गवर्नर जनरल के अधीन रखा गया
- भारत में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापन |जिसमे मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त तीन अन्य न्यायाधीश थे |सर एलिज इम्पे प्रथम मुख्य न्यायाधीश बने |
पिट्स इण्डिया एक्ट
रेगुलेटिंग एक्ट 1773
की कमियों को दूर करने के लिए एक्ट ऑफ सैटलमेंट 1781 पारित किया गया |उसके बाद
1784 में पिट्स इण्डिया एक्ट पारित किया गया | इस एक्ट की महत्वपूर्ण विशेषता इस
प्रकार है |
कंपनी के राजनैतिक
और वाणिज्यिक कार्यो को पृथक किया गया |कंपनी के राजनैतिक मामलों पर नियंत्रण के
लिए नियत्रण बोर्ड ( बोर्ड ऑफ कंट्रोल) नाम से एक निकाय का गठन किया गया | इस
प्रकार से द्वैध शासन की व्यवस्था का
आरम्भ किया है |
पहली बार कम्पनी के
अधीन के क्षेत्र को ब्रिटिश आधिपत्य का क्षेत्र कहा गया |
ब्रिटिश सरकार में
कम्पनी के कार्यों और इसके प्रशासन पर पूर्ण नियंत्रण प्रदान किया गया |यह नियंत्रण नियंत्रण बोर्ड के माध्यम से किया गया
| नियंत्रण बोर्ड भारत के सभी नागरिक सैन्य सरकार व् राजस्व गतिविधियों पर
नियंत्रण करें |
बुधवार, नवंबर 06, 2019
हिन्दी के प्रोत्साहन के लिए प्रयास
14सितम्बर को प्रतिवर्ष हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है |
विश्व हिन्दी दिवस
प्रतिवर्ष १० जनवरी को मनाया जाता है
14 सितम्बर १९९४९ को संविधान सभा द्वारा हिन्दी को राजभाषा के रूप में अपनाया और भाग 17 में इससें संबंधित प्रावधान किया |
14 सितम्बर १९९४९ को संविधान सभा द्वारा हिन्दी को राजभाषा के रूप में अपनाया और भाग 17 में इससें संबंधित प्रावधान किया |
14 सितम्बर के ऐतिहासिक
महत्त्व को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रभाषा
प्रचार समिति ने 1953 से हिन्दी दिवस का आयोजन आरम्भ किया |
हिन्दी के प्रयोग को प्रोत्साहित करने के लिए कई पुरस्कार
प्रदान किये जाते है –
कीर्ति पुरस्कार और
राजभाषा गौरव पुरस्कार
राजभाषा कीर्ति
पुरस्कार के अंतर्गत मंत्रालय/विभाग,सार्वजानिक क्षेत्र के उपक्रम ,बोर्ड/स्वायत्त
निकाय/ ट्रस्ट आदि ,राष्ट्रीकृत बैंक ,नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति , हिन्दी गृह
पत्रिका सभी क्षेत्र के लिए प्रथम
,द्वितीय एवं तृतीय पुरस्कार दिया जाता है |
राजभाषा गौरव
पुरस्कार योजना – राजभाषा विभाग हिन्दी को तकनीकी एवं विज्ञान के क्षेत्र में बढ़ाने के लिए राजभाषा गौरव पुरस्कार देता है|
केंद्र सरकार के कार्मिक के लिए भी राजभाषा गौरव
मौलिक लेखन पुरस्कार भी दिया जाता है |राजभाषा गौरव पुरस्कार वित्त वर्ष 2015-16 से आरम्भ है |
वर्ष 2018-19 के लिए राजभाषा गौरव पुरस्कार –
केंद्र सरकार के कार्मिक के लिए भी राजभाषा
गौरव मौलिक लेखन पुरस्कार
पुस्तक का नाम
|
लेखक
|
पुरस्कार
|
भारत में आधुनिक चिकित्सा
|
डॉ.दीपक प्रकाश
|
प्रथम
|
ब्रिटिश राज और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
|
डॉ. नरेंद्र शुक्ला
|
द्वतीय
|
कृषि अवशेषों से जैव ईधन
|
डॉ. रेनू सिंह, डॉ ओम प्रकाश सिंह
|
तृतीय
|
भारत के नागरिकों के लिए हिन्दी को तकनीकी एवं
विज्ञान के क्षेत्र में बढ़ाने के लिए राजभाषा
गौरव पुरस्कार देता है|
|
||
जैविक खेती :पद्धति ,प्रबंधन एवं प्रमाणीकरण
|
डॉ. बीरेन्द्र बहादुर सिंह
|
प्रथम
|
बेचैन बंदर
|
श्री विजय शर्मा
|
द्वतीय
|
भारतीय संदर्भ में व्यावहारिक सकारात्मक
मनोविज्ञान
|
श्री कमलेश
|
तृतीय
|
शनिवार, नवंबर 02, 2019
केंद्रीय सूचना आयोग
संविधान के अनुच्छेद 19 के अंतर्गत प्राप्त बोलने
के अधिकार में सूचना का अधिकार अंतर्निहित है । इस बात को सर्वोच्च न्यायालय ने
अनेको बार अपने निर्णयों से सिद्ध किया है। उसके अलावा अनेको जनआंदोलों के द्वारा
बेहतर लोकतंत्र के लिए सूचना के अधिकार की माँग जनता के द्वारा की जाती रही
है। इन सब प्रयासों से बाध्य होकर सरकार को जन सूचना अधिकार अधिनियम 2005 लाया जिसे दोनों सदनों की मंजूरी
के बाद 15 जून 2005 को राष्ट्रपति महोदय ने भी अपनी मंजूरी दे दी इस तरह 12 अक्टूबर
2005 को यह कानून देश भर में लागू हो गया |इसी अधिनियम के तहत केंद्रीय सूचना आयोग
एवं राज्य सूचना आयोगों का गठन किया गया | सूचना आयोग का गठन शासकीय राजपत्र
अधिसूचना के माध्यम से की गयी थी,इस कारण यह एक उच्च प्राधिकार युक्त निकाय है न
की संवैधानिक निकाय | यह कार्मिक मंत्रालय के अंतर्गत आता है |
सुचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त सहित 11 आयुक्त होते
है ,जिनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा
प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली एक समिति की सिफारिश पर की जाती है | इस समिति में
प्रधानमंत्री के अलावा लोकसभा में विपक्ष का नेता और प्रधानमंत्री द्वारा मनोनीत
एक कैबिनेट मंत्री |
मुख्य सूचना आयुक्त एवं अन्य सूचना आयुक्त बनने के लिए
योग्यता मुख्यतः यह है कि-
वह सार्वजनिक
जीवन का पर्याप्त अनुभव रखता हो तथा उसे विधि,विज्ञान सामाजिक जीवन का अनुभव हो वह
संसद एवं किसी राज्य विधानमंडल का सदस्य न हो|
उसे किसी भी राजनैतिक दल से जुड़ा नहीं होना चाहियें |
कार्यकाल - मुख्य सूचना आयुक्त एवं अन्य सूचना आयुक्त का
कार्यकाल 25 जुलाई 2019 से पहले 5 वर्ष
एवं 65 वर्ष की आयु जो पहले हो थी परन्तु 25 जुलाई 2019 ( सूचना अधिकार संसोधन अधिनियम 2019) के बाद कार्यकाल निर्धारण
का अधिकार केंद्र सरकार को दे दिया गया
जिसका कुछ लोगो के द्वारा विरोध किया जा रहा है
पहले वेतन और भत्ते मुख्य निर्वाचन आयुक्त के समान मुख्य सुचना
आयुक्त के थे एवं अन्य आयुक्तों के भत्ते अन्य
निर्वाचन आयुक्तों के समान ही थे | परन्तु सूचना अधिकार संसोधन अधिनियम 2019 के
द्वारा अब इसका निर्धारण केन्द्र सरकार को करना है |
(सूचना अधिकार
संसोधन अधिनियम 2019 का विपक्षी दलों एवं कुछ सामाजिक कार्यकता विरोध कर
रहे है कि सरकार सूचना आयोग को कमजोर कर रही है जबकि सरकार का कहना है कि वह केवल वेतन भत्ते एवं
कार्यकाल में संशोधन कर रही है जिसके कारण इसकी स्वायत्ता कम नहीं होगी |)
कार्य --- अगर लोक प्राधिकारी के द्वारा अधोलिखित
कार्यवाही की गयी होतो उस मामले को केंद्रीय सूचना आयोग के संज्ञान में लाया जाता
है |--
1 सूचना देने से मना कर दिया गया हो या गलत जानकारी दी
गयी हो
2 जानकारी निर्धारित समय में प्राप्त न हुई हो
3 अगर किसी को लगता है कि सूचना के एवज में मांगी गयी फीस
मनमाने ढंग से मांगी गयी है अर्थात प्रार्थना कर्ता को हतोत्साहित करने के लिए किया हो |
शक्तियां-- जाँच
के समय आयोग को दीवानी न्यायालय की शक्तियां प्राप्त है किसी भी लोक प्राधिकारी को
आयोग में बुलाना ,दस्तावेज़ प्रस्तुत करने के लिए आदेश देना एवं उसकी जाँच करना |
किसी न्यायालय या कार्यालय से सार्वजानिक दस्तावेज़ को
मंगाना |
अगर आयोग को लगता है कि लोक प्राधिकारी ने जानबूझ कर गलत सूचना दी है या सूचना को छुपाया है तो उस लोकप्राधिकारी पर 250 रूपये प्रतिदिन के हिसाब से अर्थ दण्ड लगा सकता है जो अधिकत्तम 25 हजार रूपये तक हो सकता है |
सोमवार, अक्टूबर 28, 2019
केंद्रीय सतर्कता आयोग ( CVC)
संथानम समिति की शिफारिश( 1962- से 1964) पर 1964 में केंद्रीय सतर्कता आयोग का गठन किया
गया |वर्तमान में यह एक सांविधिक निकाय है परन्तु 2003 से पहले यह न सांविधिक निकाय
था न विधिक निकाय था |
केंद्रीय सतर्कता आयोग विधेयक संसद के दोनों सदनों से सत्र 2003 में
पारित हुआ और राष्ट्रपति जी कि मंजूरी 11 सितम्बर 2003 को मिली ,इसी दिन से केंद्रीय सतर्कता
आयोग एक सांविधिक निकाय बन गया |
2004 में भारत सरकार ने इसे नामित एजेंसी के रूप में अधिकृत किया जो
भष्ट्राचार की जाँच,भष्ट्राचार के खुलासे एवं अभियुक्त पर उपर्युक्त कार्यवाही की
अनुशंसा करेगी | अगर सरकार इसकी अनुशंसा को नहीं मानती है तो उसे इसका लिखित कारण
देना पड़ेगा |
इसका चरित्र न्यायिक है इसे दीवानी न्यायालय की शक्तियाँ प्राप्त है यह
केंद्र सरकार के किसी भी प्राधिकरण से कोई भी जानकारी मांग सकता है |
आयोग वर्ष भर में किये गये कार्यो के विविरण की रिपोर्ट राष्ट्रपति को
देता है जिसे राष्ट्रपति संसद के प्रत्येक सदन में प्रस्तुत करता है |
प्रारंभ में केंद्रीय सतर्कता आयोग एक सदस्यीय निकाय था परन्तु 25
अगस्त 1998 को राष्ट्रपति
द्वारा पारित एक
अध्यादेश से यह बहु सदस्यीय
निकाय बन गया |वर्तमान समय में इसके 3 सदस्य है |
आयोग के सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा तीन सदस्यीय समिति
की शिफारिश पर की जाती है |
इस समिति में प्रधानमंत्री( अध्यक्ष ) , गृहमंत्री( सदस्य ) और लोकसभा
में नेता प्रतिपक्ष ( सदस्य ) होगें |
आयोग के आयुक्त एवं सहायक
आयुक्तों का कार्यकाल 4 वर्ष या 65 वर्ष जों भी पहले रहेगा |
अपने कार्यकाल के बाद वें केंद्र सरकार या राज्य सरकार के अधीन किसी
भी पद के योग्य नहीं रहेगें |
वर्तमान में केंद्रीय सतर्कता आयुक्त
श्री शरद कुमार है ये राष्ट्रीय
जाँच एजेंसी(NIA) के अध्यक्ष भी रह चुके है |
गुरुवार, अक्टूबर 03, 2019
राजभाषा अधिनियम 1963 ( धारा 4 से धारा 9 तक )
धारा 4 जिस तारीख से अधिनियम की धारा 3 प्रभावी होगी उसके 10 वर्ष के पश्चात राष्ट्रपति
की मंजूरी से प्रस्तावित और दोनों सदनों के द्वारा पारित किये जाने के बाद एक
संसदीय समिति का गठन किया जायेगा | जो संघ के राजकीय प्रयोजन में हिन्दी के प्रयोग
में की गई प्रगति का पुनर्विलोकन करे और पर सिफारिशें करते हुए राष्ट्रपति को प्रतिवेदन
देगा जिसे राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों में रखेगा और उसे सभी राज्यों को भेजेगा
| राष्ट्रपति सभी के मतो के आधार पर प्रतिवेदन के या उसके किसी आधार पर आदेश निकालेगा जो किसी हालात धारा 3 का अतिक्रमण
नहीं करेगा |
इस समिति में कुल 30 सदस्य होगे जिनमें 20 लोक सभा से एवं 10 राज्य
सभा से होगे |जो अनुपातिक प्रतिनिधित्व के अनुसार एकल सक्रमणीय मत के द्वारा
निर्वाचित होगे
धारा 5 केंद्रीय अधिनियम का प्राधिकृत हिन्दी अनुवाद – नियत दिन को या उसके पश्चात
राष्ट्रपति के प्राधिकार से प्रकाशित राजकीय राजपत्र – राष्ट्रपति के द्वारा निकला
गया (क)अध्यादेश,(ख)आदेश, नियम,विनियम,या उपविधि का हिंदी अनुवाद उसका प्राधिकृत पाठ समझा जाएगा
| सभी विधेयक जो संसद के द्वारा पारित होते है या होने वाले हो उनका हिन्दी
अनुवाद भी प्राधिकृत पता समझा जायेगा |
धारा 6 जहां राज्यों विधानमण्डल द्वारा
पारित अधिनियमों में अथवा उस राज्य के राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित( जिसके संबंध
में कहा गया हो ) अध्यादेशों में प्रयोग के लिए हिन्दी से भिन्न कोई भाषा निश्चित की
है वहां, संविधान के अनुच्छेद 348 के खण्ड (3) द्वारा अपेक्षित
अंग्रेजी भाषा में उसके अनुवाद के अतिरिक्त,
उसका हिन्दी में अनुवाद उस राज्य के शासकीय राजपत्र में, उस राज्य के राज्यपाल
के प्राधिकार से, नियत दिन को या उसके पश्चात् प्रकाशित किया जा सकेगा और ऐसी दशा में ऐसे
किसी अधिनियम या अध्यादेश का हिन्दी में अनुवाद हिन्दी भाषा में उसका प्राधिकृत
पाठ समझा जाएगा।
धारा 7 -
राज्यपाल रष्ट्रपति की सहमति से हिन्दी या किसी अन्य भाषा को न्यायालय के
आदेश की भाषा बना सकता है परन्तु उसका अंग्रेज़ी अनुवाद करवाना आवश्यक है |
धारा 8 – केंद्रीय सरकार इस अधिनियम के
अनुपालन हेतु कोई नियम बना सकती है | इसकी
सूचना शासकीय राजपत्र के द्वारा दी जाएगी |
धारा 9 जम्मू कश्मीर में इस अधिनियम की धारा
6 एवं 7 के उपबंध जम्मू कश्मीर में लागू
नहीं होंगे |
बुधवार, अक्टूबर 02, 2019
राजभाषा अधिनियम 1963 ( धारा 1 से धारा 3 तक )
1955 राजभाषा आयोग और संसदीय राजभाषा आयोग के द्वारा की गयी सिफारिश के
आधार पर अंग्रेंजी के प्रयोग को 1965 के बाद भी जारी रखने के लिए सन 1963 में
राजभाषा अधिनियम पारित किया गया | जिसके प्रवधान निम्नलिखित थे |--
धारा 1 – यह अधिनियम राजभाषा अधिनियम 1963 कहा जायेगा |
धारा 2 – इस अधिनियम की धारा 3, 26 जनवरी 1965 से लागु होगी , शेष
उपबन्ध तब लागु होगे जब भारत की केंद्रीय सरकार शासकीय राजपत्र के द्वारा इसे लागु
करने की घोषणा करें |
धारा 3 – मूल संविधान में कहा गया था कि संविधान के लागु होने के
पन्द्रह वर्ष तक अंग्रेजी का प्रयोग जारी रहेगा उसके बाद हिन्दी का प्रयोग
सुनिश्चित किया जायें, पर यह अधिनियम कहता है कि हिन्दी के साथ अंग्रेजी का
प्रयोग भी आगे भी जारी रहेगा | अर्थात संघ के राजकीय प्रयोजन जिनके लिए अंग्रेजी का प्रयोग
हो रहा था वहां अंग्रेजी का प्रयोग होगा एवं संसदीय कार्य में भी इसका प्रयोग जारी
रहेगा |
संघ और गैर हिन्दी भाषीय राज्य ( जिन्होंने हिन्दी को राजभाषा के रूप
में न अपनाया हो ) के मध्य पत्रचार अंग्रेजी में ही किया जायें |
हिन्दी को राजभाषा के रूप में अपनाने वाले राज्य और गैर हिन्दी भाषीय
राज्य के मध्य अगर पत्रचार हिन्दी में
होतो उसका अंग्रेजी अनुवाद अवश्य हो |
नोट: 3( 1 ) के ये उपबन्ध बाध्य नहीं करते थे कि अंग्रेजी का प्रयोग
अवश्य करें ,अगर हिन्दी भाषीय राज्य या संघ और गौर हिन्दी भाषीय राज्य आपसी सहमती
से हिन्दी में पत्राचार करते है तो कर सकते है अधिनियम इसकी अनुमति देता है |
3(2)- उपधारा धारा (1 ) के किसी बात के होते हुए भी अधिनियम की उपधारा
3(2) कहती है कि अधोलिखित विभागों के मध्य पत्राचार हिन्दी या अंग्रेज़ी में किया
जाता है वहां अनुवाद भी हिन्दी या अंग्रेजी में अवश्य दिया जाएगा |
1 केंद्रीय सरकार एक मंत्रालय
या विभाग या कार्यालय के और दूसरे मंत्रालय या विभाग या कार्यलय के मध्य |
2 केंद्रीय सरकार एक मंत्रालय
या विभाग या कार्यालय के और केंद्रीय सरकार के मालिकाना हक़ वाले या नियंत्रण में
किसी निगम या कम्पनी या उनके किसी कार्यालय के मध्य पत्राचार|
केंद्रीय सरकार के मालिकाना हक़ वाले या नियंत्रण में किसी निगम या
कम्पनी या उनके किसी कार्यालय और उनकी तरह के किसी अन्य निगम या कम्पनी या उनके
किसी कार्यालय के मध्य
3(3)- को अगर सरल शब्दों में समझे तो यह कह सकते है सभी सरकारी कागजात
हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषा में हो| किसी भी केंद्रीय सरकार के किसी विभाग
/कार्यालय/निगम/कंपनी के निकाले गये संकल्पों,साधारण आदेशों, नियमों ,अधिसूचनाएं,प्रशासनिक
अन्य प्रतिवेदनों या प्रेसविज्ञप्तियों आदि |
किसी भी केंद्रीय सरकार के किसी विभाग /कार्यालय/निगम/कंपनी निकाली गई
अनुज्ञप्ति(आज्ञा),अनुज्ञापत्रों, सूचनाओं,निविदा-प्रारूपों के लिए,प्रयोग में लाई
जाएगी |
3(4) उपधारा 1,2,3,पर प्रतिकूल प्रभाव
डाले बिना संघ जन हित एवं विभागों के कार्यों में दक्षता लाने हेतु इस अधिनियम की
धारा 8 के तहत किसी भाषा या भाषाओं का उपबंध कर सकती है |
3(5) उपधारा 1,2,3,4,तब तक प्रभावी रहेगें जब तक गैर हिन्दी भाषीय
राज्यों ( जिन्होंने हिन्दी को राजभाषा के रूप में न अपनाया हो ) की विधानसभा सभा
के द्वारा इसके लिए संकल्प पारित नहीं कर
दिया जाता है |
क्रमशः ....
मंगलवार, अक्टूबर 01, 2019
राजभाषा और संविधान
• संविधान के भाग 17
में अनुच्छेद 343 से 351 तक राजभाषा का
प्रावधान है |
• इसमें राजभाषा से
संबंधित निम्नलिखित प्रावधान है –
• हिन्दी भारत की
राजभाषा है जो देवनागरी लिपि में लिखी जाती है परन्तु अंको स्वरुप अन्तर्राष्ट्रीय
ही होगा | पारम्परिक हिन्दी में अंको का स्वरुप इस
प्रकार है १,२,३ ,४,५,६ ,७, ८,९,| परन्तु अन्तराष्ट्रीय स्वरुप इस प्रकार है 1,2 |
• संविधान लागु होने
से पंद्रह वर्षों तक वे सभी कार्य
अंग्रेजी में भी होगे जो संविधान लागु होने से पहले होते आये है |
• उसके बाद भी
संघ प्रयोजन विशेष के आधार पर अंग्रेज़ी का प्रयोग कर सकता है|
• संविधान लागु होने
के पांच वर्ष बाद एवं एवं दस वर्ष बाद पुनः एक आयोग बनाया जायेगा , जो हिन्दी के प्रयोग
को कैसे बढ़ाया जाये इसकी सिफारिश करेगा| इसकी स्थापना राष्ट्रपति करेंगे |
• राष्ट्रपति ने
संविधान के अनुच्छेद 344 के तहत शक्ति का प्रयोग करके 1955 राज्य भाषा आयोग का गठन
किया जिसके अध्यक्ष श्री बालासाहेब गंगाधर
खेर थे |
• संविधान के
निर्देशित प्रथम राजभाषा आयोग (1955) की रिपोर्ट के समीक्षा लिए गठित राजभाषा
संसदीय समिति के अध्यक्ष पं.गोविन्द वल्लभ पंत थे |( समिति में 30 सदस्य थे, जिनमें 20 लोक सभा
से 10 राज्य सभा से )
• अनुच्छेद 345से
अनुच्छेद 347 तक क्षेत्रीय भाषा के बारें में बताया गया है |
• अनुच्छेद 345 में
बताया गया है कि राज्यों की भाषा क्या होगी |
• अनुच्छेद 346 के
अनुसार एक राज्य दुसरे राज्य से किस भाषा में संवाद करेगा एवं राज्य संघ से किस
भाषा में संवाद करेगा |
• अनुच्छेद 347 में इस
बात का उल्लेख है कि किसी राज्य की जनसंख्या का बड़ा समूह जिस भाषा को बोलता उसके साथ कैसा व्यवहार करेगा |
अनुच्छेद 348 इस ओर इंगित करता है कि न्यायालयों की भाषा क्या हो एवं अधिनियमों व अन्य विनिमय किस भाषा में पारित हो| |
अनुच्छेद 348 इस ओर इंगित करता है कि न्यायालयों की भाषा क्या हो एवं अधिनियमों व अन्य विनिमय किस भाषा में पारित हो| |
•
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